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Showing posts with the label विचार मंथन

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे : डॉ. सोहन लाल

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चित्र : जलवायु परिवर्तन का परिकात्मक चित्र* यह पृथ्‍वी जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन जैसी प्रमुख समस्याओं से जूझ रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्‍वी का अस्तित्‍व ही खतरे में पड़ गया है। अगर समय रहते हम नहीं चेते तो यह धरती रहने लायक नहीं रहेगी। आज इस कड़ी में यह जानने की काशिश करेंगे कि जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण क्‍या है। इस जलवायु परिवर्तन का प्रकृति और मानव पर क्‍या असर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन का कृषि और मानव स्‍वास्‍थ्‍य पर क्‍या असर पड़ रहा है। इस सब मामले में विशेषज्ञों की क्‍या राय है। 1- ग्रीनमैन पर्यावरणविद विजयपाल बघेल का कहना है क‍ि 19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति के बाद शहरों का आकार दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा। गांव स‍िमटने लगे। रोजगार पाने के लिए गांवों की आबादी शहरों की तरफ पलायन कर रही है। आज हालात यह है कि देश में बड़े और प्रमुख महानगरों में उनकी क्षमता से अधिक आबादी निवास कर रही है। इसके चलते शहरों के संसाधनों का असीमित दोहन हो रहा है। उन्‍होंने कहा कि जैसे जैसे शहरों का विस्‍तार हो रहा है, वहां उपलब्‍ध भू-भाग दिन प

'वैवाहिक बलात्कार'(Marital Rape) - सच या सिर्फ सोच? : दीपाली

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  चित्र : प्रतीकात्मक चित्र*   आज मैं आप सभी से एक बेहद ही गंभीर और संवेदनशील विषय पर चर्चा करना चाहती हूँ। विषय है – Marital Rape या हिंदी भाषा में कहें तो वैवाहिक बलात्कार। बलात्कार के आगे लगे इस वैवाहिक शब्द को पढ़कर अचंभित मत हों , क्योंकि भारतीय समाज में इस शब्द को भले ही गंभीर और चिंतनीय न समझा जाता हो , परंतु इस शब्द और विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि विश्व के अनेक देशों ने इस स्थिति को संवैधानिक रूप से अपराध घोषित कर सज़ा तक का प्रावधान किया है। दरअसल ‘ वैवाहिक बलात्कार ’ विषय के रूप में बीते दिनों भारी चर्चा का विषय बना रहा। कारण है - दिल्ली हाईकोर्ट में वैवाहिक बलात्कार के एक मामले पर आया फैसला , जिसमें दो जजों की बेंच ने इसके निर्णय पर विभाजित फैसला सुनाया। हाईकोर्ट के इस विभाजित फैसले ने मेरा ध्यान भी इस विषय की ओर आकर्षित किया। अपनी सामाजिक व संवैधानिक समझ का विस्तार करने के उद्देश्य से मैंने भी इस विषय पर अध्ययन तथा चिंतन आरम्भ किया, जिसमें कुछ गंभीर प्रश्न मेरे सामने उपस्थित हुए। प्रश्न था - कि जब भारतीय दंड संहिता की धारा 498 व 498 A के तह

महिला सशक्तिकरण या समाज का सच : दीपाली

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  चित्र  :  एस. पेचियामल्ल आज मैं आप सभी के समक्ष दो अलग-अलग स्त्रियों के जीवन संघर्ष को प्रस्तुत करना चाहती हूँ जिन्होंने सामाजिक बेड़ियों, वर्जनाओं और मानसिक तथा शारीरिक प्रताडनाओं के बावजूद दृढ़तापूर्वक विपरीत परिस्थितियों के सक्षम हार नहीं मानी। इन जिंदगियों पर मेरे द्वारा किया गया यह मंथन है जो आज के आधुनिक दौर में भी समाज की न बदलती हुई तस्वीर को हमारे समक्ष उकेर कर रख देता है जिसमें स्त्रियों को अन्य पर निर्भर होने के कारण ही नहीं बल्कि स्वावलंबी बनने के क्रम में भी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना व शोषण का शिकार होना पड़ता है। इसमें एक कथा है तमिलनाडु राज्य के थूथुकड़ी जिले के कट्टुनायकमपट्टी नामक गाँव में 36 वर्षों से पुरुष बनकर जीवन जीने के लिए मजबूर होने वाली एस. पेचियामल्ल की। जिसे 20 वर्ष की उम्र में विवाह के उपरान्त मात्र 15 दिन के भीतर ही वैधव्य का भार झेलना पड़ा। पति के देहांत के लगभग नौ माह पश्चात् जनम हुआ उसकी बेटी का जिसके पालन-पोषण का प्रश्न एस. पेचियामल्ल के सामने आ खड़ा हुआ। इसके लिए महिला ने किसी से भी आर्थिक सहायता लेने की बजाय स्वयं की मेहनत से जीवन यापन का प्रयास किया

वीरांगना नांगेली

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  वीरांगना नांगेली वीरांगना नांगेली का प्रतीकात्मक चित्र*   आपने इस ब्लॉग पेज पर प्रतिरोध कविता का अध्ययन अवश्य किया होगा। उसी प्रतिरोध के स्वर को सन 1924 में मुखरित करने वाली स्त्री रही थी ‘वीरांगना नांगेली’। जिसके द्वारा प्रज्जवलित की गयी संघर्ष और प्रतिरोध की ज्वाला ने तथाकथित निम्न वर्ग के साथ होने वाले विचित्र और निकृष्ट सामाजिक भेदभावों रूपी दीवार को धराशायी कर दिया। निचले तबके के साथ किये जाने वाले भेदभाव, उससे उपजी असंतुष्टि और उसके विरोध में संघर्ष के साथ नांगेली की यह विद्रोही पुकार केरल के उस त्रावणकोर जिले से मुखरित हुई थी, जिसका अस्तित्व सन 1924 में एक स्वतंत्र साम्राज्य के रूप में था। इस साम्राज्य में उच्च जातियों के सम्मान का सूचक बनाकर एक ऐसे कानून को सामंतशाही द्वारा तथाकथित निम्न वर्ग की स्त्रियों पर लागू कर दिया गया था, जिसके अंतर्गत अपने शरीर के ऊपरी हिस्से अर्थात् स्तनों को सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी कपड़े आदि से ढंंकने की मनाही थी, क्योंकि ऐसा करना उच्च जाति वर्ग के लोगों को सम्मान देना समझा जाता था। इस कानून की अवहेलना करने पर एक मोटी धनराशि कर के रूप में वसूल क