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भारत वैभव

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इस पुस्तक में वेद तथा ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषद् सहित वेदाङ्ग एवं उपवेद में वर्णित आर्ष ज्ञान परंपरा, पुराणों की महत्ता, दर्शन व उसके विविध स्वरूप, भारत राष्ट्र की सनातनता के वास्तविक स्वरूप, भारतीय संस्कृति सभ्यता संस्कार व लोक व्यवस्थाएँ, भाषाओं व लिपियों का विकास, अंक व गणित विद्या, कालगणना की भारतीय अवधारणाएँ, प्राचीन शिक्षा पद्धति की उत्कृष्टता, कला (नृत्य, संगीत, वाद्य व (स्थापत्य) तथा साहित्यिक वाङ्मय की विपुलता, वैज्ञानिक अन्वेषणों की विलक्षण उपलब्धियों पारिस्थितिकी के अनुरूप तकनीकी दक्षता, आयुर्वेद चिकित्सा व भक्ष्याभक्ष्य विचार , योग साधना, पर्यावरण के प्रति भारतीय दृष्टि, कृषि व उद्योग का उत्कर्ष, अर्थ - चिन्तन की शुचिताएँ, राजनीति व दण्ड विधान की मौलिकता के साथ परिशिष्ट में भारतीय ऋषि परम्परा, महाभारत काल पश्चात् हुए राजवंशों तथा प्रमुख भारतीय पर्व व त्योहारों की सूचियों के अतिरिक्त वैश्विक विद्वानों द्वारा भारतीय ज्ञान परम्परा की प्रशस्ति में व्यक्त किए गए। उदगारों को समावेशित किया गया है। पुस्तक का नाम : भारत वैभव लेखक : ओम प्रकाश पाण्डेय प्रकाशन वर्ष : 2020 प्रकाशन संस्था

उधर के लोग : अजय नावरिया

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 अजय नावरिया का यह उपन्यास उधर के लोग भारतीय संस्कृति की विशिष्टता और वैयक्तिक सत्ता के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों को रेखांकित करता है। बेशक, यह उनका पहला उपन्यास है, लेकिन अपनी शिल्प संरचना और वैचारिक परिपक्वता में, यह अहसास नहीं होने देता। उपन्यास में हिन्दू कहे जानेवाले समाज के अन्तर्विरोधों, विडम्वनाओं और पारस्परिक द्वेष के अलावा, उसके रीति-रिवाजों का भी सूक्ष्म और यथार्थपरक अंकन किया गया है। यह द्वंद्व भी उभरकर आता है कि क्या वर्णाश्रम धर्म ही हिन्दू धर्म है या कुछ और भी है ? उपन्यास, पाठकों में प्रश्नाकुलता पैदा करता है कि क्या 'जाति' की उपस्थिति के बावजूद 'जातिवाद' से बचा जा सकता है ? क्यों विभिन्न समुदाय, एक-दूसरे के साथ, सह -अस्तित्व के सिद्धान्त के तहत नहीं रह सकते ? क्यों भारतीय साहित्य का संघर्ष, डी-क्लास होने के पहले या साथ-साथ डी-कास्ट होने का संघर्ष नहीं बना ? इसके अलावा उपन्यास में बाजार की भयावहत, वेश्यावृत्ति, यौन-विकार, विचारधाराओं की प्रासंगिकता, प्रेम, विवाह और तलाक़ पर भी खुलकर बात की गई है। उपन्यासकार की सबसे बड़ी विशेषता यथार्थ को रोचक, प्रभ

21 वीं सदी के लिए 21 सबक़ : युवाल नोआ हरारी

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अप्रासंगिक सूचना के सैलाब में डूबी इस दुनिया में स्पष्टता एक बड़ी शक्ति है। सिद्धान्ततः मनुष्यता के भविष्य की बहस में कोई भी व्यक्ति हिस्सा ले सकता है, लेकिन एक स्पष्ट दृष्टि बनाए रखना बहुत मुश्किल है। अक्सर तो इस ओर हमारा ध्यान तक नहीं जाता कि कोई बहस चल रही है, या यह कि निर्णायक महत्त्व के सवाल क्या है। जाँच - पड़ताल की विलासिता पालना हम में से अरबों लोगों के वश की बात नहीं है, क्योंकि इससे कहीं ज्यादा जरूरी काम है, जो हमें करने पड़ते है हमें अपने काम पर जाना होता है, बच्चों का पालन - पोषण करना होता है, या अपने बूढ़े माँ - बाप की देखभाल करनी होती है। बदकिस्मती से, इतिहास कोई छूट नहीं देता। अगर मनुष्यता के भविष्य का फ़ैसला आपकी गैरमौजूदगी में होता है, क्योंकि आप अपने बच्चों का पेट भरने और तन ढँकने के काम में बेहद व्यस्त है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप और वे इसके नतीजों से बचे रहेंगे। यह बहुत ही अन्याय की बात है, लेकिन कौन कहता है कि इतिहास न्यायपूर्ण होता है ? एक इतिहासकार के रूप में मैं लोगों को भोजन और वस्त्र मुहैया नहीं करा सकता, लेकिन मैं थोड़ी - बहुत सुस्पष्टता की पेशकश करने की को

Blood & Faith - Matthew Carr

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              In 1609, the entire Muslim population of Spain was given three days to leave Spanish territory or else be killed. In a brutal and traumatic exodus, entire families were forced to abandon the homes and villages where they had lived for generations. In just five years, Muslim Spain had effectively ceased to exist; an estimated 300,000 Muslims had been removed from Spanish territory making it what was then the largest act of ethnic cleansing in European history.               Blood and Faith is a riveting chronicle of this virtually unknown episode, set against the vivid historical backdrop of Muslim Spain. It offers a remarkable window onto a little-known period in modern Europe-a rich and complex tale of competing faiths and beliefs, of cultural oppression and resistance against overwhelming odds.

वह भी कोई देस है महराज - अनिल यादव

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अनिल यादव की यात्रा कृति ' वह भी कोई देस है महराज ' को पढ़ते हुए और उसके जिक्र से मेरा रक्तचाप बदल जाता है । मेरा मन उसको तरह - तरह से विज्ञापित करने का होता है, महान पूर्वज यात्रियों के वृत्तांत और संवाद पढ़ते हुए मैं अनिल की इस कृति पर आकर ठिठक गया हूँ । लेखक पथ का दावेदार नहीं है , वह जीवनदायी अन्वेषण करता है । पूर्वोत्तर को घनीभूत मूलभूत उद्घाटित करते हुए अनिल यादव ने हिन्दी के पाठकों को एक वृहत्तर भारत देखने वाली नज़र दी है । पूर्वोत्तर देश का उपेक्षित और अर्धज्ञात हिस्सा है , उसको महज सौन्दर्य के लपेटे में देखना अधूरी बात है । अनिल यादव ने कंटकाकीर्ण मार्गों से गुजरते हुए सूचना और ज्ञान , रोमांच और वृत्तांत , कहानी और पत्रकारिता शैली में इस अनूठे ट्रैवलॉग की रचना की है । वे लम्बी दूरी के होनहार लेखक हो सकते हैं -ज्ञानरंजन