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कविता क्या है ? (चिन्तामणि) : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

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  मनुष्य अपने भावों , विचारों और व्यापारों को लिए दिए दूसरों के भावों , विचारों और व्यापारों के साथ कहीं मिलाता और कहीं लड़ाता हुआ अंत तक चला चलता है और इसी को जीना कहता है। जिस अनंत-रूपात्मक क्षेत्र में यह व्यवसाय चलता रहता है उसका नाम है जगत्। जब तक कोई अपनी पृथक् सत्ता की भावना को ऊपर किए इस क्षेत्र के नाना रूपों और व्यापारों को अपने योगक्षेम , हानि-लाभ , सुख-दु:ख आदि से संबद्ध करके देखता रहता है तब तक उसका हृदय एक प्रकार से बद्ध रहता है। इन रूपों और व्यापारों के सामने जब कभी वह अपनी पृथक् सत्ता की धारणा से छूटकर-अपने आपको बिलकुल भूलकर-विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है , तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है , उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधाना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है , उसे कविता कहते हैं। इस साधाना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग का समकक्ष मानते हैं। जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है , उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की