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जब मैं लिखता हूँ : भूपेंद्र रावत

जब मैं लिखता हूँ, वफ़ा लिखता हूँ। तेरे बिन ज़िंदगी की सज़ा लिखता हूँ बग़ावत कर देती है कलम मेरी जब भी बेवफ़ाई की वजह लिखता हूँ।                                        - भूपेंद्र रावत 

जिंदगी : भूपेंद्र रावत

 हर दर्द के लिए दवा नहीं दी जाती हर दफ़ा जीने की वजह नहीं दी जाती जी ली जाती है जिंदगी अपने ही असूलों से दूसरों के सहारे ज़िंदगी की निबाह नहीं दी जाती। ज़िंदगी मे काफिले और भी है तेरे सिवा जीने की और भी वज़ह है तेरे सिवा एक तू ही नही जो दवा दे हर ज़ख्म की दर्द-ए-पैहम अभी और भी है तेरे सिवा जब कोई रिश्ता निभाना मुश्किल हो  अपनो पर हक़ जताना मुश्किल हो निकाल लो बाहर खुद को रिश्तों के उस बोझ से जहाँ रिश्तों का वज़ूद बचाना मुश्किल हो जब जिरह किसी रिश्ते की बुनियाद बन जाती है अपनो के बीच ही खुद का वज़ूद खोती जाती है टूट जाती है नेह की डोर उस वक़्त रिश्ते की डोर जब नाज़ुक हो जाती है ज़िंदगी दर्द में, जीना अक़्सर सीखा ही देती है ज़ख्म हो गहरा, दर्द को पीना सीखा ही देती है नही की जाती यां किसी से मरहम की उम्मीद अक्सर ख़ामोशी लबों को सीना सीखा ही देती है                                                    - भूपेंद्र रावत 

एक साथ : भूपेंद्र रावत

 यूं ही मुक़म्मल नही होती, बातों से ज़िंदगी एक साए की तरह साथ निभाना होता है वायदों से नजाने क्यों मुकर जाते है, लोग उम्रभर रूह को, जिस्म का भार उठाना होता है।                                             - भूपेंद्र रावत

कहां बसा भगवान : भूपेंद्र रावत

 हाड़ मास के पुतले हम सब  फ़क़त यही हमारी पहचान है इंसानियत सबकी मर गयी है बताओ कौन बचा इंसान है। नाम मात्र धरा पर जीवित है,सब भीतर दफ़न एक श्मशान है। इंसानियत जिसकी अभी शेष है फ़क़त वही बचा एक इंसान है। पूजे मंदिर, मस्जिद, गिरजा भटक रहा इंसान है। नकारे अपना अपनो को ही बता कहां बसा भगवान है।                                             - भूपेंद्र रावत 

माँ को हर क्षण मुस्कुराते देखा है : भूपेंद्र रावत

 माँ को हर क्षण मुस्कुराते देखा है ज़िन्दगी की किताब में  मुश्किल पन्नो को भी  हँसी से पलटाते हुए देखा है । बुढापे की सीढ़ी में  दरख्तों को साया बन साथ निभाते हुए देखा है । फ़लक से टूटते तारों को  अक्सर जगमगाते हुए देखा है।                                - भूपेंद्र रावत

सच और झूठ : भूपेंद्र रावत

 झूठ को झूठ कहना अपराध है, यहाँ सच के टिकने की अब औकात हैं, कहाँ ज़माना टिका है खोखली बुनियादों पर झूठा इंसान ही अब आबाद है यहाँ                                   - भूपेंद्र रावत 

ख़ामोशी : भूपेंद्र रावत

  मेरी खामोशी बताती है मेरा हाल अब हर्फ़ों का वज़ूद ही कहाँ रहा एक ओर हो रही है बग़ावत मेरे अंदर मैं गुमसुम बैठा सब सहता ही रहा                                       - भूपेंद्र रावत           

प्रकृति की गोद में : भूपेंद्र रावत

  रहने दो मुझे प्रकृति की गोद में, खुले आसमान के नीचे, आधुनिक होते शहर के शोर से दूर। जहाँ से हुई थी, मानव युग की शुरुआत, मनुष्यों ने सीखा था, जीवन जीना वृक्षो, नदियों और पक्षियों से परन्तु विकास के स्वर ने प्रकृति खड़ा कर दिया विनाश के कटघरे में।                                                     -   भूपेंद्र रावत