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बाबूजी की साईकिल : अभिनव

        सांवले रंग , नाटे कद और कमीज़-पतलून के सीधे-सादे परिधान में सुबह-सुबह बाबूजी अपने विद्यालय चले जाया करते थे। उनके व्यक्तित्व में विशेष प्रकार की जिजीविषा थी। वे सदा मंद मुस्कान लिए घर से रुकसत होते थे। उनका चेहरा साधारण था परंतु फिर भी आकर्षक था। उनके चेहरे पर चेचक के गहरे दाग थे परंतु इससे किसी भी प्रकार की कुरूपता न आई थी। सभी से नमस्कार करते हुए जब वे अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करते थे तब ऐसा प्रतीत होता था जैसे कोई शिक्षक नहीं बल्कि कोई निर्दोष विद्यार्थी विद्यालय जा रहा हो। बाबूजी का मानना भी था कि एक शिक्षक को जीवन भर एक विद्यार्थी बने रहना चाहिए। ताकि वो सीखने-सिखाने की परंपरा में सदैव सशक्त बना रहे। इन सबके बीच उनकी प्रिय एवं सहयोगी साथी उनके साथ ज़रूर होती थी जो उन्हें उनके गंतव्य तक प्रतिदिन पहुंचाती थी। उनके व्यक्तिव को वो पूर्ण-रूपेण सार्थक करती थी। वो निरंतर आगे बढ़ने का परिचायक थी और वह थी उनकी साईकिल।           बाबूजी ने न जाने कितने मेले , बगीचों आदि की सैर हम दोनों भाईयों को करायी थी। पीछे मैं , सीट पर बाबूजी और साईकिल के अगले डंडे पर एक सीट बनवा दी गई थी ज