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मैं मिलूंगा तुम्हें : भूपेंद्र रावत

 मैं मिलूंगा तुम्हें  ज़िंदगी के उसी मोड़ पर जिस सफ़र के मोड़ पर तुम मुझे  छोड़ कर गयी थी तन्हा। मन करे अगर  तुम्हारा तो लौट आना लेकिन इस बार मैं दूंगा  तुम्हे एक शपथ ज़िंदगी भर  साथ रहने की। क्या निभा पाओगी वादा? मेरे संग ज़िंदगी भर साथ रहने का अगर हाँ तो स्वागत है तुम्हारा फिर से  उस उदासी भरे  कमरों की चौखटों पर उम्मीद करता हूँ,कि तुम नीरस सी  इस ज़िंदगी के केनवास में फिर से भरोगी खुशहाली के रंग।

पिताजी : भूपेंद्र रावत

पापा तो बस ख़ुद को समझाते रह गए बच्चों की ख्वाइशों को अपना बताते रह गए जिसके कभी ना आयी माथे पर सिकन  बच्चों को परेशानी में देख आंसू बहाते रह गए बाहर से कठोर और भीतर से नरम थे वो अपने दर्द को भीतर छुपाते रह गए ज़िंदगी में जरूरत तो हज़ार थी उनकी भी, लेकिन हमारी फरमाइशों के लिए खुद, ज़रूरतों पर मरहम लगाते रह गए। आभूषण बनी रही मुस्कान हमारे लबों की हमारी मुस्कान को बस वो और सज़ाते रह गए। दरख़्त थे वो, जो खड़े रहे  हर मुश्किल क्षण में  सूरज की तपिश में स्वयं तपाते रहे गए।                                              - भूपेंद्र रावत 

स्त्रियाँ : भूपेंद्र रावत

 कहना है कुछ लोगों का  कमजोर होती है स्त्रियाँ  क्योंकि,धकेल दिया जाता है  शुरू से उसे उस गर्त में  जहां पहले से ही  बेचारी समझकर  समझा दिया जाता है,  पाठ ज़िंदगी का तुम्हारी जगह है  घर के भीतर की चारदीवारी। कर दी जाती है सीमित  उसकी आकांक्षाएं। उन्हीं आकांक्षाओ ने उसे सीखा दिया जीना पिंजरे में। अब उस स्वर्ण जैसे पिंजरे में उसे देनी पड़ती है आहुति अपने सपनों की पराया धन समझकर  नम आंखों के साथ कर दी जाती है विदा अपनी इच्छाओं की  तिलांजलि दे, पुनः सजाती है, एक ख़्वाब,फूटते हुए अंकुर में   समाहित है,दफन हुए ख्वाबों  के सच होने की ख्वाईश। - भूपेंद्र रावत 

माँ : भूपेंद्र रावत

भटक जाऊँ अगर माँ राह से  तुम राह दिखाने तो आओगी। दूर हो तो क्या हुआ माँ मेरा साया  बन मुझे चलना तो सिखाओगी । जब होगी तुम करीब मेरे माँ हर पहाड़ जैसी मुसीबत स्वयं ही  उलटे पैर दूर हो जायेगी । तुम्हारी चंद दुआओं से ही माँ मेरी ज़िंदगी सवंर जायेगी । माँ तुम्हारा हर मुश्किल क्षण में भी मुस्कुराना तुम्हारी ये जिंदादिली ही  तो मुझे मेरे मुश्किल पलों में  जीना मुझे सिखाएगी । माँ तुम ही तो ज़िन्दगी का असल अर्थ मुझे समझाओगी । तुम ही तो हो मेरी प्रेरणादायक  राह में गिरकर,सम्भलना तुम ही तो बताओगी ।  तुम ही तो हो माँ  तमस में चाँद की रोशनी बन पथ से अवगत कराओगी ।                                     - भूपेंद्र रावत

जोकर : भूपेंद्र रावत

हंसता हूँ, हँसाता हूँ मन सबका बहलाता हूँ हंसता हूँ, हँसाता हूँ मन सबका बहलाता हूँ ढीला, ढाला पैजामा पहन झूम झूम कर आता हूँ हाथ पर आग गोले लेकर उछल पार कर जाता हूँ बन्द थैले में अपने, हंसी छुपा कर लाता हूँ खुद उदास होता हूँ, लेकिन फिर भी मैं सबको हँसाता हूँ दिल सबका बहलाता हूँ, मनोरंजन कराता हूँ रोते हुए को हंसना मैं सिखाता हूँ इसलिए बच्चों मैं जोकर कहलाता हूँ दुनिया के सारे दुख दर्द भूल सबको हँसाता हूँ सिर के बल चल, बांस पर करतब दिखाता हूँ जोकर हूँ, मनोरंजन कराने आता हूँ इसलिए बच्चों मैं जोकर कहलाता हूँ अलबेला हूँ मस्ताना हूँ, हाथ छोड़ लहराता हूँ अपनी मस्ती में रहता हूँ, ग़मो को भूल जाता हूँ खुशियों से भरा खज़ाना मैं छुपा कर लेकर आता हूँ इसलिए बच्चों में जोकर कहलाता हूँ ।                                                          - भूपेंद्र रावत

अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च : अभिनव

  ( चीन द्वारा गलवान क्षेत्र पर आक्रमण के संदर्भ में लिखित कविता)                                                           मुझे बुद्ध का उपदेश ध्येय नहीं , गाँधीजी का अहिंसा व्रत भूल जाओ , ‘ आल्हा ’ का वीरगान बजे बस , शत्रु खेमे में हाहाकार मचाओ , ना ’ पाक को बाद में देखेंगे , पहले अक्साई में विजय पताका लहराओ , हाथ में अंबुज केसरिया , श्वेत , हरित सब रंग मिल जाओ , अमर वीरगाथा झाँसी की रानी , नेताजी सुभाष का स्मरण कराओ , मरे वीर प्रहरी आर्य धरा के , अब न कोई प्राण गँवाओं , एक-एक आर्य पुत्र दस को काटे , रण की ऐसी भेरी सुनाओ , भले नाम है चीनी शत्रु का , मधुरता की आशा किन्तु भूल जाओ , बहुत क्षमा मिली इन दैत्यों को , मानवता का इन्हें अब पाठ पढ़ाओ , बहुत हुआ मैत्री का संदेश , होती क्या है शत्रुता इन्हें केवल सबक सिखाओ , माँ भारती के लालों को श्रद्धांजलि देने वाले बुद्धिजीवियों , कभी सीमा पर लड़ने भी जाओ , क्रोध भरा हिन्द धरा के मनुजों में , शत्रु रक्त से अब शांत कराओ , या तो वह रह जाएँ या हम , अब आर-पार का युद्ध किन्तु लड़ जाओ , बारम्बार श्वेत हिमालय शोणित हुआ , अ

अफवाहें : भूपेंद्र रावत

  अफवाहें भी ख़बर बन जाती है ज़िन्दगी जीने का सबक बन जाती है सच अक्सर छुप जाता है,अखबारों में झूठ, फ़रेब बिकता है सरेआम बाज़ारो में चारों और झूठ की मंडी सज़ती है अंधी कानून व्यवस्था चोरो की बस्ती है बस्ती में बैठे कानून के रखवाले है चंद टुकड़ों में जो बिकने वाले है वहशी, गुंडे सारे सत्ता लोभी हो जाते है स्वार्थ के ख़ातिर संविधान को भूल जाते है संविधान इनके हाथों की कठपुतली बन जाता है लाचार जनता का दुःख कौन समझ पाता है जनता बेचारी भूखी मर जाती है दाने दाने के लिए तरसती नज़र आती है  अनाज़ रोपा जाता था कल तक जिस मिट्टी में हाड़ मांस के पुतले आज मिल जाते है उस मिट्टी में                                                      - भूपेंद्र रावत

वसंत फिर आया है : अभिनव

  (वसंत फिर आया है)   पर्वतों की हिम शिखर श्वेत श्रृंखला से संदेश आया है पतझड़ बीते पुष्प खिले प्रकृति का यौवन आया है नवीन उमंग संचार धैर्य का पारितोषित आया है आर्य धरा का संस्कार प्रकृतांचल का आशीष आया है वसंत फिर आया है , वसंत फिर आया है।   हृदय हर्ष की पराकाष्ठा कृष्णोत्सव आया है मनोहर पुष्प सार भालाभिषेक सुगन्धित क्षण आया है सुमन पिपासा अचला का मनोभाव आया है नाना प्रकार वनस्पति का सौंदर्य श्रृंगार आया है वसंत फिर आया है , वसंत फिर आया है।   समायातीत का गौरव वीरत्वाभिमान आया है सूर्य की रूधिर लालिमा का प्रणाम उन्हें आया है अखंड आर्यभूमि संस्कारच्युत नहीं हो पाया है ‘ वसुधैव कुटुंबकम ’ वाहकों ने प्रतिकार जताया है वसंत फिर आया है , वसंत फिर आया है।   हिन्द से हिन्दुकुश विजय तोष का बिगुल बजाया है मस्जिद में आरती , मंदिरों ने अजान सुनाया है आर्य पुत्र हैं हम , प्रत्येक हिन्दी का लहू पुकार आया है वीरों का रक्त से भाल तिलक हो आया है वसंत फिर आया है , वसंत फिर आया है।   पुष्प आच्छादित पथ , शूर चरण स्पर्श करे , रण बांकुरों का बुलाव

बेटियां : भूपेंद्र रावत

  एक सुंदर उपहार होती है बेटियां पूरा संसार होती है बेटियां अँधेरी रात में जगमगाती  रोशनी का साथ होती है बेटियां स्वयं की नही संसार की लाज़ होती है बेटियां संगीत की साज होती है बेटियां बहते जल की धारा की आवाज़ होती है बेटियां बहती ठंडी पवन की एहसास होती है बेटियां सुखे खेतों की प्यास होती है बेटियां खोखले खड़े ढांचों की मजबूत बुनियाद होती है बेटियां मीठी मीठी सी याद होती है बेटियां जीने की आश होती है बेटियां  संसार का निर्माण करती है बेटियां                                              -भूपेंद्र रावत 

लाशें : भूपेंद्र रावत

 सड़क किनारे तड़प रही थी मरकर वो लाशें भी मदद की गुहार लगा सड़ गयी थी,वो लाशें भी भीड़ थी चारों तरफ़ डर का सा माहौल था ज़िंदा था इंसा मग़र उनका कहां कोई मोल था अखबारो के मुखपृष्ठ में छपी ख़बर थी वो पाठकों के रोंगटे खड़े करने वाली छोटी सी झलक थी वो लोगों ने बड़े जोश में वीडीयो बनाई थी शेयर की थी फोनों में और सबको दिखाई थी इंसान तो ज़िंदा थे,इंसानियत कहां बच पाई थी मर गया था इंसा, चर्चा बाकी की लड़ाई थी कारण गिनाने वाले विद्वानो की भीड़ आयी थी न्यूज़ चैनल के माध्यम से वक्ताओं ने दी सफाई थी पोस्ट मार्टम किया तो पता चला भूख से लड़ाई थी, कई दिन के भूखे ने, जान से कीमत चुकाई थी मर जाने के पश्चात एक बात समझ में आई थी भूख से मरने वालों की कोई नही दवाई थी                                            -भूपेंद्र रावत

उम्मीद मत हारों : भूपेंद्र रावत

 उम्मीद मत हारो आसमा के  घनघोर काले बादल छट जाएंगे।  फिर सूरज की नई मध्यम  किरणों के साथ नए दिन की शुरुआत होगी। आशा की नई किरण एक नया  उत्साह, हर्षोउल्लास के साथ जीने के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करेगी। जरूरी नही की जीवन के हर मार्ग पर  चलते हुए आपको सफलता मिले। जीवन के कई चरणों में प्रयासरत रहने के पश्चात भी हमकों सफलता नही मिलती लेकिन जीवन का वो संघर्ष हमारे अधिगम में वृद्धि के साथ साथ जीने के  नए आयाम भी सीखाता है तथा  हमारे भीतर मन्ज़िल तक  पहुँचने की प्यास को भी बनाए रखता है।                                       -  भूपेंद्र रावत

बेरोजगार : भूपेंद्र रावत

बेरोजगार हूँ,  अब,लोगों से मिलने से  डरता हूँ। रोज़गार की तलाश में  हर रोज़  दर बदर भटकता हूँ। क्यों,कहाँ,कब,कैसे अब जीवन का  एक हिस्सा है। रोज़गार के सिवा न कोई और इच्छा है। रोज़गार शब्द में "बे" नाम का उपसर्ग बड़ा निक्कमा है। अब तो लगता है,जैसे आत्मा का बोझ धोने पर  शरीर भी शर्मिंदा है।                          - भूपेंद्र रावत

उत्तराखंड और पलायन : भूपेंद्र रावत

  उत्तराखंड की बन गयी एक नयी पहचान पलायन है, इसका दूसरा नाम आमजन के पास है,  न रोटी,न कपड़ा, न मकान नेता जी लगे है चमकाने में  अपने बंगले, कोठी और मकान बन गए है, कई गांव श्मशान मसाण पूजने भी  नही जाते वहां अब इंसान सूख चुके है, कई खेत और खलिहान पीने को पानी नही खाने को अन्न का दाना नही  न कोई जरूरी सामान फ़क़त शहरों तक सीमित रहा विकास का नाम फाइलों में दब गया गांव के विकास का काम ऐसे देवभूमि उत्तराखंड के  विकास को देश का सलाम                         - भूपेंद्र रावत

प्रतिरोध : मनोज कुमार

  जंग लग चुके इस जहा में, अब कहीं परिरोध नज़र नहीं आता। वो आग नज़र नहीं आती,  वो ग़ुबार नज़र नहीं आता,  चारों तरफ देखने पर भी वो देहखता अँगार नज़र नहीं आता। नज़र आते हैं तो सिर्फ थके हारे, लाचार, बेबस, अपनी ही लाचारी का रोना रोते, अपनी खो में छुपे, व्यवस्था का झुनझुना बन चुके, सिर्फ हाड़ मांस के लूथरे। जो किसी भी वक्त बिक जाने को तैयार हैं, इस बाज़ारीकरण के दौर में। सब कुछ बिक रहा है इस बाजार में संवेदनाएं, भावनाएं, मौत, दर्द, चीख का बाजार चारों ओर बिछा है। लेकिन कहीं दूर देखने पर एक चिंगारी नज़र आती है, ये चिंगारी है जंगलों के आग की, जो निरतंर एक लंबे इतिहास को अपने में समेटे हुए है,  जिंदा रखे हुए है प्रतिरोध की अपनी चेतना को।  जो एहसास दिलाती है कि हमारा अस्तित्व तभी तक है जब तक हम प्रतिरोध कर सकेंगे।  अन्यथा हम भी औरों की तरह केवल हाड़ मांस के लूथ्ड़े बन कर रह जायेंगे। और मिटा दिये जायेंगे सदा-सदा के लिए भूत, वर्तमान व भविष्य से। हम सिर्फ इतिहास होंगे, लेकिन इतिहास के पन्नों पर हमारे नाम की स्याही तक न होगी।                                                                    - मनोज कुमार 

बदलता शहर : मनोज कुमार

  देखते ही देखते कितना बदल गया ये शहर, आसमा अभी भी वही है मगर न जाने धूल में कहां उड़ गया ये शहर, घर के पास का पीपल अब खामोश सहमा हुआ रहता है, शायद वो डरा हुआ है क्योंकि खो दिया है उसने चिड़ियाओं की चहचाहट को, कई दिनों से कोई चिड़िया उसकी टहनी पर नहीं आयी, अब आते हैं तो सिर्फ गिद्ध और बाज जो उस पीपल पर टेडी नज़र बनाये हुए हैं, शायद चुभता है उनकी आँखों में ये वृक्ष, विकास के नरभक्षी घूम रहे हैं शहर में चारों ओर उन्हें कोई नदी,  तालाब या  पेड़ रास नहीं आता। ये वही शहर है जिसने कभी कोई दंगा नहीं देखा था, पर एकाएक न जाने क्या हुआ इस शहर को पहले तो इसने अपना नक्सा बदला और अब इंसा को। और अब देखते ही देखते सड़कों का रंग भी बदल गया। कच्ची थी तो अच्छी थी ये सड़क जब से पक्की हुई है, सन चुकी है खून से। आज इस शहर में न जाने क्यों एक घुटन सी होती है। मंदिर की घंटी, मस्जिद की अजान, पुलिस की गाड़ियों के सायरन में मानों दब से गये हैं। सच कहूं तो अब अंदर ही अंदर न जाने, कैसा एक भय पलता है अपने अस्तित्व को लेकर। और दूर तक देखने पर अपना कोई नज़र नज़र नहीं आता। सिवाय इस वृक्ष के, देखते मेरी ही तरह चुप चाप डरा सहमा

जीवन का अनुराग कविता : मनोज कुमार

  शब्दों की जुगाली भर नहीं होती 'कविता', समाज की अंतरंग गहराईयों से जूझती, कवि मन से उधेड़बुन करती,  जीवन की अंनत गहाराइयों में बसी, सुख-दुख, संत्रास व अहम को चुनौती दे, सत्ता की ईंट से ईंट बजा दे, वो होती है, कविता। इस से भी बढ़ कर, रोते हुए को हँसना सीखा दे,  मरते हुए को जीना,  प्रकृति के अंग-अंग को अपने में समा ले,  जीवन के गूढ़ रहस्यों को सुलझा दे, वो होती है कविता।  कवि के परिपूर्ण क्षणों की वाणी है, कविता । जीवन का अनुराग है, कविता।                                        - मनोज कुमार 

काश में एक परिंदा होता : मनोज कुमार

  काश में एक परिंदा होता न मेरा कोई घर होता, न कोई मेरा देश होता  न कोई धर्म होता, न कोई मजहब होता  न मैं हिन्दू होता, न कोई मुसलमा होता काश मैं एक परिंदा होता। बहता इन हवाओं में गूंजता इन फ़िज़ाओं में, ये सारी धरा अपनी ये सारा आसमा अपना होता काश में एक परिंदा होता। न मुझ में कोई भय होता न कोई ईष्या बिना कोई छल कपट के ये सारा जहां अपना होता काश मै एक परिंदा होता                                        - मनोज कुमार 

अंत की शुरुआत : मनोज कुमार

         अंत की शुरुआत  बैठा हूँ एक अंधेरे कोने में, बुझे हुए अरमानों की लौ लिए ये मेरे अंत की शुरुआत है। तन्हाई को सीने में लिए कुरेद रहा बीते लम्हों को शायद ये मेरे अंत की शुरुआत है। पल-पल सिमट रहा मुझ में मैं अपनी ही खोह में मुँह छिपाये बैठा अपने अंतर्मन की आत्मा से उधेड़बुन करता  ये मेरे अंत की शुरुआत है। सोचता हूँ तो कांप जाता हूँ कितना भयावह होगा मेरा ये अंत, पर मुझे फिक्र नहीं, क्योंकि मैं मरूँगा शान से, मैंने जिंदगी की धज्जियाँ उड़ाई हैं।                                                                 -   डॉ. मनोज कुमार