सबिता शाह की कविताएँ

सबिता शाह की कविताएँ

सुनो, काश तुमसे इतनी मोहब्बत ना होती

कि, तुम्हें खो देने का एहसास

तुमसे मिलने से ज्यादा हो गया।

तेरी बातें समझ नही आती

खुद में इतना उलझ गये है।

सही और गलत की पहचान

अब करना भी भूल गये है।

खुद से हर पल लड़ रहे है

कभी हार,कभी जीत रहे है।

भर लो ना अपनी बाहों में

कब से तुमसे कह रहे है।

सबिता शाह

 

 

हजारो की कीमत इनसे पूछो

हमें लाखो भी कम पड़ते है।

कितनी ख्वाहिशें पूरी होती है

फिर भी हम रोते फिरते है।

चलते रहते है नंगे पैरों से

मंजिल कहा होती है इनकी।

जहाँ मिल जाये अन्न का दाना

वही गुजरती है रात इनकी।

सुकून कहा है चेहरे पर

बस चिंता के भाव है।

दो वक्त रोटी की जुगाड़ में

जिंदगी इनकी बेजार है।

सबिता शाह

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