संदीप पारीक‘निर्भय’ की कविताएँ

संदीप पारीक‘निर्भय’ की कविताएँ
कैय सको आप बलात्कार ई
मांची पर होय’र आडो
आखी रात
जोवूं आभौ
चांद – तारा
पून रै हलायां
हालता दरखत
ऊभली मचकावती डाळियां
जीवणै-डावै
बैठ दरखतां
बोलता गग्घू नै कोचरियां।
कालनै आं माथै
अेक-आद कोई कविता
लिखीज जावै
म्हारी कलम सू़ं
तो होय जावै जीव सोरौ
आ सोचता थकां फोरूं पसवाड़ा।
आधी रात
खोसूं झींटा खुदोखुदी
सूख जावै म्हारा कंठ
होय’र बैठो
पी’र पाणी
मांची पर फेरूं
होऊँ आडौ
नीं पड़ै जक
पण आंख्यां में
सोचतौ-
पकड़णो चाऊँ
अेक नवी-नकोर
कविता रो ओर-छोर।
गांव-गळी रा
भूंसता गंडक
बूढ़ा-बडेरा
मायतां रै मुंडै
सुणतौ आयौ हूं-
“कै आं नै अधरात
सांपड़दै दिखै
ओपरी छिंया।”
तद विचारूं
क्यूं नी आवै
म्हांनै अबळेखो
कविता रो.?
पून होळै-होळै
पळूंसती डी’ल
स्यात केवै-
“सोज्या बेटी रा बाप.!”
भाख फाटगी
पण हाल तांई
ताबै नीं आई
अेक कविता..
बापू री दाकळ
कर दियो खड़ो
फट देणी होय ऊभो
सामटतो बिंछावणां
मनोमनी हुई बंतळ
भोळा भाई.!
धक्को चालै कदैई.?
धक्को सिरजण रो नीं
बिधवंस रो नांव है.!
जिणनै केवणनै तो
केय सको आप बलात्कार ई.!
जावतौ रैयो बंजरपणौ
किरसै रै पसैव री
नान्हीं-नान्हीं छांट
हँसती-पड़ती
लुळ-लुळ लूमती हिंडै ई
बाजरी रै सिट्टां।
अर म्हूं
खेत रै अदबिचाळै
खेजड़ी तळै
सांभळ्यां
कागद अर कलम।
चाणचकां
किरसै री हिमायती
नान्हीं छांटां
छुड़ावती सिट्टां सूं हाथ
आय’र बैठी
ओळ्यां रै मिस
म्हारै कागद पर।
खेत ज्यूं-
हरियल होय उठ्यौ
सूखौ कागद
महकी सबदां री फसलां
अर जावतौ रैयो बंजरपणौ।
ऊंडी प्रीत
आभै सूं उतरती
लुळ-लुळ
नान्हीं छांट
छम-छम करती
गीत गाती
मदमाती
नीचे पड़ता ई
तिरसो मरु
गालै
गळबांथ
होय जावै दोन्यूं
अेकमेक
इणनैं कैवै-
ऊंडी प्रीत.!
नांव- संदीप पारीक‘निर्भय’
गांव-पूनरासर, हुड्डा रो बास(श्रीडूँगरगढ़)
कानाबाती-7792062071

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