उम्मीदवारों को झेलना पड़ रहा है भाषाप्रेमियों का विरोध

उम्मीदवारों को झेलना पड़ रहा है भाषाप्रेमियों का विरोध
सूरतगढ़ ! सात दशकों से मान्यता के लिए जूझ रही देश के सबसे बड़े प्रान्त राजस्थान की मायड़ भाषा राजस्थानी की मान्यता को लेकर प्रदेशवासी मुखर होते नजर आ रहे है। भाषाप्रेमियों द्वारा लिए गए संकल्प के चलते उम्मीदवारों को भाषाप्रेमियों का विरोध झेलना पड़ रहा है। भाषाप्रेमियों ने घरों,दुकानों व अन्य प्रतिष्ठानों पर भाषा सम्बधित स्लोगन म्हारे “मन में खोट नई,भाषा नई तो वोट नई, कैदयों आ डंकै री चोट, पैली भाषा पछै वोट,भाषा कोनी तो वोट कोनी” आदि लगाए हुए है। यह क्रम प्रदेशभर में चलाया जा रहा है।   जयपुर में इस मिशन की कमान डॉ. बीए माली अशांत, के सी मालू, जोधपुर में प्रो. कल्याणसिंह शेखावत, उदयपुर में शिवदान सिंह जोलावास, नोहर में डॉ.भरत ओळा,हनुमानगढ़ में हरीश हैरी, श्रीगंगानगर में अनिल जांदू, मोहन आलोक,पवन सोखल, बीकानेर में विनोद सारस्वत,प्रशांत जैन, तुलसीराम मोदी, सूरतगढ़ में मनोजकुमार स्वामी, हरिमोहन सारस्वत, परसराम भाटिया, डां. एस के जेतली, इन्द्रकुमार कोठारी आदि दिन-रात एक किए हुए हैं।  राजस्थानी भाषा मान्यता समिति के प्रदेश महांमत्री मनोजकुमार स्वामी ने बताया कि इस बार की लड़ाई राजे बनाम राजस्थानी है। भारतीय जनता पार्टी ने 2013 के घोषण पत्र में राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने का वादा किया था लेकिन पांच साल बीत जाने के बावजूद इस ओर कोई कदम नहीं उठाया और फिर इस बार भी 2018 के घोषण पत्र में वही वादा फिर दोहरा दिया। भाषाप्रेमियों को आक्रोश है कि यदि 2019 के लोकसभा के चुनाव से पहले राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं दी गई तो केन्द्र सरकार को भी सत्ता से वंचित होना पड़ेगा।

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