सचखण्ड स्कूल में छोटे साहिबजादों की शहीदी के उपलक्ष्य में चौपाई साहिब का पाठ

सचखण्ड स्कूल में छोटे साहिबजादों की शहीदी के उपलक्ष्य में चौपाई साहिब का पाठ

हनुमानगढ़। जंक्शन के सचखण्ड स्कूल में शनिवार को छोटे साहिबजादों की शहीदी के उपलक्ष्य में चौपाई साहिब का पाठ करवाया गया। इस मौके पर बाबा संतोख सिंह जी ने चौपाई साहिब का पाठ किया और विद्यालय में समस्त बच्चों ने साथ साथ चौपाई साहिब का पाठ किया। विद्यालय डायरेक्टर मलकीत सिंह मान ने बताया कि चौपाई साहिब के पाठ का विद्यालय में करवाने का मुख्य उद्देश्य छोटे साहिबजादों की शहीदी के बारे में बच्चों को अवगत करवाना है। उन्होने बताया कि ऐसे कार्यक्रमों में बच्चों में संस्कारों का विकास होता है। उन्होने बताया कि विद्यालय का मुख्य उद्देश्य बच्चों को केवल किताबी ज्ञान देना नही बल्कि उसके साथ साथ व्यवहारिक ज्ञान और संस्कारों का ज्ञान देना भी है। पाठ के दौरान श्री सुखमनी साहिब सेवा सोसायटी के सदस्यों ने बच्चों को छोटे साहिबजादों की शहदत के बारे में संबोधित करते हुये कहा कि गुरू गोबिन्द सिंह को चारों साहिबजादों की शहीदी को कोई भूले से भी नहीं भुला सकता। आज भी जब कोई उस दर्दनाक घटना को याद करता है तो कांप उठता है, गुरू गोबिन्द सिंह के बड़े साहिबजादें बाबा अजीत सिंह और जुझार सिंह चमकौर की जंग मुगलों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे, उन्होंने ये शहीदी 22 दिसम्बर और 27 दिसम्बर 1704 को पाई इस दौरान बड़े साहिबजादों में बाबा अजीत सिंह की उम्र 17 साल थी जबकि बाबा जुझार सिंह की उम्र महज 13 साल की थी, .मगर जो उम्र बच्चों के खेलने कूदने की होती है उस उम्र में छोटे साहिबजादों ने शहीदी प्राप्त की, छोटे साहिबजादों को सरहंद के सूबेदार वजीर खान ने जिंदा दीवारों में चिनवा दिया था, उस समय छोटे साहिबजादों में बाबा जोरावर सिंह की उम्र आठ साल थी जबकि बाबा फतेह सिंह की उम्र केवल 5 साल की थी इस महान शहादत के बारे में हिन्दी के कवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है जिस कुल जाति देश के बच्चे दे सकते हैं जो बलिदान उसका वर्तमान कुछ भी हो भविष्य है महा महान। गुरूमत के अनुसार अध्यात्मिक आनन्द पाने के लिए मनुष्य को अपना सर्वस्व मिटाना पड़ता है और उस परम पिता परमेश्वर की रजा में रहना पड़ता है इस मार्ग पर गुरू का भगत , गुरू का प्यारा या सूरमा ही चल चल सकता है इस मार्ग पर चलने के लिए श्री गुरू नानक देव जी ने सीस भेंट करने की शर्त रखी थी एक सच्चा सिख गुरू को तन , मन और धन सौंप देता है और वो किसी भी तरह की आने वाली मुसीबत से नहीं घबराता, इसी लिए तो कहा भी गया है मेरा मुझमें कुछ नही जो कुछ है सो तेरा, तेरा तुझको सौंप के क्या लागै है मेरा। पाठ के समापन पर शहर की सुख स्मृद्धि की कामना के साथ अरदास कर प्रसाद वितरण किया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *