यह लड़की मुझे कहाँ मिलेगी.? – संदीप पारीक‘निर्भय’ की कविता

संदीप पारीक‘निर्भय’ की कविताएँ
आज से कुछ दिन पहले
तुमने मुझे भेजी थी
अपनी एक तस्वीर
और मैंने उसे आहिस्ता से
रख लिया
अपने दिल के किसी कौने में,
हाँ,तस्वीर के पीछे तुमने
लिपस्टिक से
यह भी लिखा था
कि ‘मेरे लिए एक कविता करना.!’
मेरे सूखे प्यासे हियै में
खेजड़ी के भांति
तुम्हारे लिए
उग आया है अथाह प्रेम
जो कि-
आंधियों-भतूळियों के
थपेड़े सहकर भी
हरा-भरा व अडिग खड़ा रहेगा..
तस्वीर में तुम:,
सफेद कपड़े पहनी हुई
अति सुंदर लग रही हो
मानों कि आसमान से
मेरी हथेली पर
कोई ‘परी’ उतर आई हो,
गुलाब की पंखुड़ियों जैसे
तुम्हारे अधरों पर
थिरकती भीनी मुस्कराहट,
गालों व छाती को देखकर
लगता है कि तुमने अभी अभी
जवानी की दहलीज़ पर
अपने पाँव धरे हो
और तुम्हारी पतली नाक में
पहनी हुई सुंदर नथ
मेरी कविता में बिंब बन चमकती है.
जब मैं घर की छत पर बैठकर
तस्वीर को चूमता हुआ
अपलक निहारता हुआ
तुम्हारे लिए:,
कविता कर रहा होता हूँ
तब उदास चाँद
मेरे पास चुपके से आकर
मुस्कराता हुआ
होले से मुझसे पूछता है
कि यह लड़की मुझे कहाँ मिलेगी.?
मैं कविताएँ तुम्हारे लिए नही करता हूँ
आज से कुछ ही दिन पहले
तुमने एक सांस में
कितनी आसानी के साथ
मुझे कहा था
कि तुम्हारी कविताएँ नहीं पढ़ा करूँगी.!
इससे मुझे कोई आपत्ति नही है
मैं कविताएँ
तुम्हारे लिए नही करता हूँ
मेरी कविताओं में
जीता जागता थार धड़कता है
तुम्हारा दिल नही,
मेरी कविताओं में
आंसुओ की बूँदे चमती है
तुम्हारा झूठा प्रेम नही,
और मेरी कलम
किसान का पसीना लिखती है
तुम्हारे देह से उठती सुगंध नही.
मरुधर के भोले-भाले पखेरू
चीं..चीं..चीं..करते हुए
मेरी कविताओं के हरफो को चुगकर
फोग,खींप,केर,खेजड़ी पर क्रीड़ा करेंगें
और बाजरी के बुंटे पर बैठकर
खेत में खड़ा अड़वे को
आंधियो व भतूळियो से लड़ना सिखाएंगे.
तेरी मेरी प्रेम कहानी नाम बदलकर सुनाता हूँ
प्रिय.!तुम्हें याद है वो दिन
कँवारी होती हुई भी तुम
मेरे लिए:,
करवा चौथ का व्रत रखती
सारे दिन भूखी रहती
सफ़ेद सलवार-कुर्ता पहनकर
खेत में बनी
झोंपड़ी से बाहर निकलकर
शीतल धोरे पर आ बैठती
तुम्हारी काली मोटी आँखें
चाँद उग आने का इंतजार किया करती.
सांझ ढ़लते-ढ़लते तुम्हारे लिए मैं:,
घर से चूर चूरमा
फोफळिये की सब्जी
और बाजरी की कुछ रोटी ले आता.
मेरे मुख से निकलने वाले कथा के हर शब्द
तुम अपनी:,ठुड्डी पर
दाएँ हाथ की अंगुलियां रखकर
बड़े ही ध्यान से सुना करती,
और चाँद का जी भर दीदार कर
मेरे सम्मुख बैठकर
थोड़ी नज़रे जुकाकर
सरमाती हुई
अपनी लम्बी चुटिया से खेलती हुई
मेरे गर्म हाथ से पहला निवाला लेती.
फिर ‘तुम’ और ‘मैं’ हंसते खिलते हुए
एक दूसरे के कंधों पर हाथ धरकर
जवान होती हुई
उस खेजड़ी के तले चले जाते
जिसकी पेढ़ू पर हम दोनों नें
आहिस्ता आहिस्ता से
दाँती से दिल बनाकर अधूरे नाम खोदे
जो कि-तुम्हारा नाम
‘प’ से शुरू होता है और ‘स’ पर खत्म
और मेरा नाम
‘स’ से शुरू होता है और ‘प’ पर खत्म.
उस करवा चौथ के बाद हम कभी नहीं मिले
हाँ पर,
तुम्हारी सांसों की सुगंध
मेरे हिये से अभी भी सिमटी हुई है..
अब जब यदा कदा मेरी पत्नी खेत जाती है
खेजड़ी के पास जाकर अधूरे नाम देखकर
जानना चाहती है पूरे नाम
सुनना चाहती है प्रेम कहानी
तब मैं उसे:,
आंसुओं की बूंदों के साथ
एक लम्बी सांस लेकर
तेरी मेरी प्रेम कहानी नाम बदलकर सुनाता हूँ.
संदीप पारीक‘निर्भय’
पूनरासर( श्रीडूँगरगढ़)
7792062071

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