माँ की दुआ : भूपेंद्र रावत

माँ नजाने कौन सी एक दवा रखती है

अपना अलग ही एक फ़लसफ़ा रखती है

हो जाये संताने माँ से चाहे जितनी दूर 

फिर भी लबों पर उनके लिए दुआ रखती है


 अब तू मेरी और परवाह ना कर

ख़ुदा से अब कोई और दुआ ना कर

मान ले दस्तूर तू बेबस ज़िंदगी का

अब ख़ुद की तू और ज़िबह ना कर।


 दुआओं में नाजाने कौन सी दवा रखी है

शायद ज़िंदगी जीने की एक रज़ा रखी है

ख़ुद को एक ताबूत में कैद रख कर

खुद के लिए ज़िंदा रहने की एक वजह रखी है।


 

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