स्त्रियाँ : भूपेंद्र रावत

 कहना है कुछ लोगों का 

कमजोर होती है स्त्रियाँ 

क्योंकि,धकेल दिया जाता है 

शुरू से उसे उस गर्त में 

जहां पहले से ही 

बेचारी समझकर 

समझा दिया जाता है, 

पाठ ज़िंदगी का

तुम्हारी जगह है 

घर के भीतर की

चारदीवारी।

कर दी जाती है सीमित 

उसकी आकांक्षाएं।

उन्हीं आकांक्षाओ ने

उसे सीखा दिया जीना

पिंजरे में।


अब उस स्वर्ण जैसे

पिंजरे में उसे देनी पड़ती है

आहुति अपने सपनों की


पराया धन समझकर 

नम आंखों के साथ

कर दी जाती है विदा


अपनी इच्छाओं की 

तिलांजलि दे, पुनः सजाती है,

एक ख़्वाब,फूटते हुए अंकुर में  

समाहित है,दफन हुए ख्वाबों 

के सच होने की ख्वाईश।


- भूपेंद्र रावत 

Comments

  1. सच ही है कि स्त्री गढ़ी जाती है।

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