पलायन से जूझता उत्तराखंड : भूपेंद्र रावत

 

चित्र : पलायन का प्रतीकात्मक चित्र *

लगभग 23 वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश से विभाजित होकर बने भारत के 27वें राज्य उत्तरांचल की स्थापना 9 नवंबर 2000 में  हुई। जिसका नाम 2007 में उत्तराँचल से बदलकर  उत्तराखंड किया गया। उत्तराखंड को एक नए राज्य का दर्जा देने का मुख्य उद्देश्य, विकास से वंचित  समग्र उत्तराखंड को विकास के नए आयामों तक ले जाना था, लेकिन इतने वर्षों के पश्चात भी उत्तराखंड के संदर्भ में विकास शब्द मात्र एक छलावा प्रतीत होता है।

उत्तराखंड में विकास केवल मैदानी क्षेत्रों सिमित रह गया हैं। विकास का हल्ला तो बहुत देखने को मिलता है परंतु जैसे ही हम पहाडी क्षेत्र की ओर बढ़ते है तो पहाड़ का आधारभूत ढांचा या फिर आधारभूत सुविधाएं उन कोरें पेपरों तक सीमित हो जाती है जिन पर बड़े-बड़े नेताओं और अधिकारियों का स्वामित्व है।

प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पहाड़ शब्द जितना सुंदर या मनमोह) लगता है, उससे कई अधिक बुरा उस वक़्त लगता है जब आम जन जमीनी सच्चाई से रूबरू होता है। कई उत्तराखंड स्वतंत्रता सेनानियों की आहुति से बने राज्य के साथ आजतक सौतेला व्यवहार हुआ है जिस कारण आजतक इस राज्य की स्थिति में कोई अधिक बदलाव नही आया है।

आंकड़ो के अनुसार उत्तराखंड का क्षेत्रफल लगभग 53,484 वर्ग km है। जो कि क्षेत्रफल के अनुसार उत्तराखंड राज्य 19वें स्थान और आता है।

प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध है, विशेष रूप से पानी और जंगलों में कई ग्लेशियरों, नदियों, घने जंगलों और बर्फ से ढकी पर्वत चोटियों के साथ। चार-धाम, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के चार सबसे पवित्र और पूजनीय हिंदू मंदिर शक्तिशाली पहाड़ों में स्थित हैं। यह वास्तव में भगवान की भूमि (देव भूमि) है।

देव भूमि कही जाने वाली उत्तराखंड की मुश्किलें तब और बढ़ जाती हैं जब जीवन जीने के मूलभूत संसाधन कम हो जाते हैं तो ऐसे में जीविकोपार्जन के लिए पलायन करना पड़ता है।

खाली होते गांव :-

विकास के जिस मॉडल को उद्देश्य(शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ) मानकर पर्वतीय क्षेत्र उत्तराखंड अस्तित्व में आया था, वह मॉडल आजतक अपनी नींव को मज़बूत करने के लिए जमीन तलाश रहा है, लेकिन 22 वर्षों के संघर्षों के पश्चात भी उत्तराखंड की आम जनता आधारभूत सुविधाओं से वंचित है जिसकी वजह से बहुत बड़ी संख्या में युवा वर्ग शहर की ओर पलायन करने को मज़बूर है।

पहाड़ों से निरंतर हो रहे पलायन का अंदाजा उत्तराखंड सरकार द्वारा गठित पलायन आयोग की पहली रिपोर्ट  से लगाया जा सकता है! आयोग की पहली रिपोर्ट के अनुसार 2011 में उत्तराखंड के 1034 गांव खाली हो चुके थे, साल 2018 तक 1734 गांव खाली हो चुके हैं और 405 गांव ऐसे थे, जहां 10 से भी कम लोग रहते हैं राज्य मे 3.5 लाख से अधिक घर वीरान पड़े हैं, इन खाली और वीरान पड़े गांव में जाने वाला कोई नहीं है सबसे बड़ी बिडंबना तो यह है की राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र रावत जी के गृह जनपद पौड़ी से 300 से अधिक गांव खाली हो चुके है! रिपोर्ट के अनुसार पलायन के मामले में पौड़ी और अल्मोड़ा जिले शीर्ष पर हैं !

  • 50 फीसदी ने रोजगार के लिए घर छोड़ा
  • 15 फीसदी ने शिक्षा के लिए
  • 8 फीसदी ने इलाज कराने के लिए

वैसे तो पहाड़ों  में ज़िन्दगी मुश्किल होती है ये मुश्किलें तब और बढ़ जाती हैं जब जीवन  में मूलभूत संसाधन का अभाव हो।  इसलिए पहाड़ों से पलायन का कारण  मूलभूत संसाधनों का अभाव है। वर्तमान में पहाड़ो से दो तरह का पलायन देखने को मिलता है एक तो वे लोग हैं जो हमेशा के लिए ही उत्तराखंड छोड़ चुके हैं उनके घर और गांव बंजर हो चुके हैं और वे वापस पहाड़ों में नहीं जाना चाहते हैं दूसरे वे लोग हैं जो अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए पहाड़ी गांवों से देहरादून, ऋषिकेश, कोटद्वार, हरिद्वार, रामनगर, रूद्रपुर, या हल्द्वानी तथा अन्य शहरों में आ गए है उत्तराखंड के गांवों से शहरों में बच्चों की पढ़ाई के नाम पर हो रहा यह पलायन एक सोचनीय विषय है। इसके अलावा पहाड़ो में चिकित्सा स्वास्थ्य, बिजली,  सड़के व अन्य मूलभूत सुविधाओं की कमी होना भी पलायन का कारण हैं।


बेरोजगारी के कारण पलायन करने वालों में सर्वाधिक युवा वर्ग :-

एक कहावत तो आपने सुनी ही होगी "पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, पहाड़ का काम नहीं आती" यह बात आज का समय में उत्तरiखंड में बिलकुल सटीक बैठती है, पहाड़ों से निरंतर हो रहे पलायन करने वालों में सर्वाधिक युवा वर्ग है  जिसका कारण रोजगार के नाम पर पहाड़ों पर कुछ भी नहीं है, जिसके कारण युवा रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे शहरों में पलायन करने को मजबूर हो रहे है ! उत्तराखंड के 13 जिलों में 5,31,174 पुरुष और 3,38,588 महिला बेरोजगार रजिस्टर्ड हैं। इनमें ग्रैजुएट पुरुष बेरोजगार 1,08,248 और महिला ग्रैजुएट 1,11,521 हैं। जाने वालों में 42 फीसदी लोगों की उम्र 26 और 35 वर्ष की है। 25 साल से कम आयु के 28 फीसदी लोग गए हैं। लगभग 70 फीसदी युवा बेरोजगारी के कारण पलायन करने को मजबूर है, जो की एक सोचनीय विषय है।

यह भी एक बड़ी विडंबना ही है कि उत्तराखंड में जमीन खरीद बिक्री का कानून अन्य हिमालयी राज्यों की तरह कठिन नहीं बनाया गया और उत्तराखंड राज्य के लोगो के पास पैसों का अभाव होने के कारण तराई और मैदानी क्षेत्रों के अलावा पहाड़ों के भीतर पर्यटन और होटल व व्यावसायिक इस्तेमाल की जमीनें राज्य के बाहरी यानी गैर उत्तराखंडी मूल के लोगों ने बहुत ही सस्ते दामों पर खरीद लिया है, जिससे राज्य में बेरोजगारी की समस्या बढ़ने के कारण निरंतर पलायन हो रहा है।

अत: प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध उत्तराखंड राज्य आज भी अपनी मूलभूत सुविधाओं की लड़ाई लड़ रहा है। जिसके अभाव में हर वर्ष नजाने कितने गाँव खंडहर में तब्दील हो रहे है। विकास की दौड़ में,

उत्तर प्रदेश से विभाजित होकर अपनी अलग पहचान बनाने निकला भारत का 27 वां राज्य उत्तराखंड आज स्वयं पहचान का मोहताज बन चुका है। प्रकृति की गोद से दूर अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, और  रोजगार की तलाश में शहर की ओर पलायन करते हुए युवा तथा खाली होते गांव इसके दर्द की नई कहानी है।


संदर्भ :-

* चित्र dw.com से प्राप्त 

https://www.uttarakhand-darshan.com/2020/01/blog-post.html?m=1

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