पिताजी : भूपेंद्र रावत


पापा तो बस ख़ुद को समझाते रह गए

बच्चों की ख्वाइशों को अपना बताते रह गए


जिसके कभी ना आयी माथे पर सिकन 

बच्चों को परेशानी में देख आंसू बहाते रह गए


बाहर से कठोर और भीतर से नरम थे वो

अपने दर्द को भीतर छुपाते रह गए


ज़िंदगी में जरूरत तो हज़ार थी उनकी भी, लेकिन

हमारी फरमाइशों के लिए खुद, ज़रूरतों पर मरहम लगाते रह गए।


आभूषण बनी रही मुस्कान हमारे लबों की

हमारी मुस्कान को बस वो और सज़ाते रह गए।


दरख़्त थे वो, जो खड़े रहे  हर मुश्किल क्षण में 

सूरज की तपिश में स्वयं तपाते रहे गए।


                                             - भूपेंद्र रावत 

Comments

Popular posts from this blog

भारतीय साहित्य में विभाजन का दर्द

वीरांगना नांगेली

संयुक्त राष्ट्र की भाषाओं में हिंदी शामिल

'वैवाहिक बलात्कार'(Marital Rape) - सच या सिर्फ सोच? : दीपाली

महिला सशक्तिकरण या समाज का सच : दीपाली

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर शायरी

ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत

बाबूजी की साईकिल : अभिनव

Blood & Faith - Matthew Carr

सत्य वचन (उत्तराखंड की लोक कथा) : भूपेंद्र रावत