आधुनिक तकनीक और तनाव : भूपेंद्र रावत


प्रतीकात्मक चित्र*

आज के इस आधुनिक युग में हमने स्वयं को जिस तरह की वातावरण में कैद कर लिया है ऐसी स्थिति में स्वयं को स्वस्थ रख पाना किसी करिश्मे से कम नही है। आज के वर्तमान परिदृश्य में स्वयं को स्वस्थ रखना स्वयं के लिए एल चुनौती से कम नही है।

बदलते युग में बदलती हुई दिनचर्या, रहन-सहन, भोजन इत्यादि ने हमारे जीवन को इस हद तक प्रभावित कर दिया है कि हम आंशिक या पूर्ण रूप से अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए अब यंत्रो पर आश्रित है जिनका निर्माण हमने स्वयं अपनी सुविधाओं के लिए किया था उपकरणों ने आज हमें अपना दास बना कर रख दिया है, किंतु इनके परिणाम इतने घातक होंगे किसी ने सोचा भी नही होगा। अगर हम पहले के लोगों की बात करें तो वह आज के व्यक्तियों से अधिक स्वस्थ इसलिए थे क्योंकि उपकरणों/यंत्रो से वह उतनी ही दूर थे जितने दूर आज हम अपने अच्छे स्वस्थ से है।

स्वस्थ रहने या होने से तात्पर्य व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक तथा सामाजिक रूप से स्वस्थ्य होने से है।

आज आधुनिक यंत्रो ने हमें अपनी बेड़ियों में इस तरह जकड़ लिया है कि एक अच्छा हृष्ट-पृष्ट दिखने वाला व्यक्ति भी मशीनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण मानसिक तनाव में रहने को मज़बूर है, लेकिन इस तरह के अदृश्य रोग को समाज मे रोग नहीं माना जाता है।

 ऐसा कहा जाता है कि मनुष्य की सोच उसे उस सांचे में ढाल देती है, जैसा कि वह सोचता है। ऐसी स्थिति में मानसिक रूप से तनावग्रस्त व्यक्ति के भीतर अनेकों तरह के नकारात्मक विचार जन्म लेते है जो दीमक की भांति उसके शरीर को खोखला कर देते है।

अब यह प्रश्न उठना स्वभाविक है कि आज के इस युग मे जहाँ हर कोई तकनीकी दुनिया का दास बन चुका है, उसमे स्वस्थ्य समाज का निर्माण कैसे सम्भव है?

अगर हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहते है तो सर्वप्रथम व्यक्तिगत रूप से स्वयं का आकलन करने की ज़रूरत है। जिसकी शुरुआत निम्न प्रश्नों क्या, क्यों, कैसे आदि से की जा सकती है।

क्या :- अर्थात समस्या क्या है?

क्यों :- समस्या क्यों है?

कैसे :- समाधान कैसे संभव है? इत्यादि।


आधुनिक यंत्रो से उचित दूरी:- स्वस्थ रखने की इस कड़ी में स्वयं को आधुनिक तकनीक से जितना संभव हो सके दूरी बना लेनी चाहिए। जैसे कि अगर हम पहले समय की बात करे तो मोबाइल कुछ इक्का दुक्का लोगो के पास ही देखने को मिलता था लेकिन आज बच्चों से लेकर बड़ों तक सबकी पहुंच हो चुकी है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आज इंटरनेट तथा मोबाइल की मदद से सारी दुनिया हमारी मुट्ठी में क़ैद है। लेकिन इन तकनीक के हद से अधिक प्रयोग के कारण अप्रत्यक्ष रूप से इसका प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ा है। जैसे कि गर्दन में दर्द, अवसाद, तनावग्रस्त रहना, चिड़चिड़ापन, नींद कम आना इत्यादि।


व्यायाम तथा योग का अभ्यास :- स्वस्थ जीवन व्यतीत करने के लिए नियम के अनुसार नियत व्यायाम, योग तथा अध्यात्म करके कई तरह के रोगों से मुक्ति संभव है।


उचित आहार :- उचित खान - पान भी हमारी दिनचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कहा जाता है कि "you are what you eat" अर्थात (तुम वही हो जो तुम खाते हो) कई रोगों का निवारण ही उचित खान-पान है। इसलिए हमें नियमित उचित आहार का सेवन करना चाहिए।


अनिरुद्ध जोशी हमारे ऋषि-मुनि कह गए हैं, 'पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख जेब में हो माया। ' यदि काया अर्थात शरीर रोगी है तो आप धन कैसे कमाएंगे। यदि पहले से ही अपार धन है तो वह किसी काम का नहीं।

अतः कहा जा सकता है कि आज के युग मे अपने आप को स्वस्थ्य रखना थोड़ा कठिन जरूर है लेकिन असंभव बिल्कुल भी नही, बशर्ते अपनी जुबाँ, कार्यो आदि पर आपका नियंत्रण है तो। कहा जाता है कि दुनिया से जितना जीतना आसान है, स्वयं से जितना उतना ही कठिन और वैसे भी बिना संघर्षों के कोई भी चीज नही मिलती।


                                                                                  -भूपेंद्र रावत




*उपरोक्त चित्र सोशल मीडिया से प्राप्त 


Comments

  1. यंत्र पूर्ण युग ने न सिर्फ हमें यंत्रवत् बना दिया है बल्कि मन और तन से भी रोगी बना दिया है।

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  2. प्रयोगकर्ता पर निर्भर करता है, टेक्नोलॉजी को वरदान बनाना है या अभिश्राप।

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  3. सही कहां आपने मित्र हद से अधिक किसी भी वस्तु का प्रयोग शरीर के लिए हानिकारक होता है

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