वीरांगना नांगेली

 

वीरांगना नांगेली

वीरांगना नांगेली का प्रतीकात्मक चित्र* 

आपने इस ब्लॉग पेज पर प्रतिरोध कविता का अध्ययन अवश्य किया होगा। उसी प्रतिरोध के स्वर को सन 1924 में मुखरित करने वाली स्त्री रही थी ‘वीरांगना नांगेली’। जिसके द्वारा प्रज्जवलित की गयी संघर्ष और प्रतिरोध की ज्वाला ने तथाकथित निम्न वर्ग के साथ होने वाले विचित्र और निकृष्ट सामाजिक भेदभावों रूपी दीवार को धराशायी कर दिया। निचले तबके के साथ किये जाने वाले भेदभाव, उससे उपजी असंतुष्टि और उसके विरोध में संघर्ष के साथ नांगेली की यह विद्रोही पुकार केरल के उस त्रावणकोर जिले से मुखरित हुई थी, जिसका अस्तित्व सन 1924 में एक स्वतंत्र साम्राज्य के रूप में था। इस साम्राज्य में उच्च जातियों के सम्मान का सूचक बनाकर एक ऐसे कानून को सामंतशाही द्वारा तथाकथित निम्न वर्ग की स्त्रियों पर लागू कर दिया गया था, जिसके अंतर्गत अपने शरीर के ऊपरी हिस्से अर्थात् स्तनों को सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी कपड़े आदि से ढंंकने की मनाही थी, क्योंकि ऐसा करना उच्च जाति वर्ग के लोगों को सम्मान देना समझा जाता था। इस कानून की अवहेलना करने पर एक मोटी धनराशि कर के रूप में वसूल किये जाने का प्रावधान भी कर दिया गया था। जिसे ‘मूलाकरम’ कहा जाता था। इस कर को हम आज की भाषा में ‘Breast Tax’ कह सकते हैं।

          निम्न वर्ग की स्त्रियों पर लगाये गये इस नियम को स्वीकारने के लिए ये स्त्रियाँ इस सीमा तक बाध्य थीं कि असहजता महसूस करते हुए भी विरोध करने का साहस नहीं दिखा सकती थी, परंतु ऐझवा जाति की नांगेली ने स्त्री के सम्मान पर चोट कर उच्च वर्ग के सम्मान से जोड़ने वाले इस नियम के प्रति साहस दिखाते हुए और अपनी असंतुष्टि जाहिर करते हुए न सिर्फ शरीर के ऊपरी भाग (स्तनों) को सार्वजनिक स्थानों पर ढंककर रखना आरंभ किया, बल्कि साथ ही इसे अपराध ठहराकर लिए जाने वाले कर को देने के लिए भी वह तैयार नहीं थी। इसी से उच्च वर्ग के बीच नाराजगी बढ़ने लगी। जिसका कारण था- नांगेली के तन ढंकने को स्त्रियों के सम्मान की रक्षा से न जोड़कर उच्च जाति वर्ग के अपमान की तरह देखा जाना। इस संपूर्ण स्थिति की जानकारी जब सामंतशाही शासक को हुई, जिस पर उनके द्वारा नांगेली से कठोरता पूर्वक टैक्स वसूलने के लिए कुछ सिपाहियों को भेजा गया। जिन्होंने नांगेली तथा उसके पति को अनेक शारीरिक तथा मानसिक यातनाएं दी। जिन पर क्रोधित नांगेली ने घर के भीतर जाकर अपने स्तनों को हंसिया से काटकर, केले के पत्ते पर सजाकर द्वार पर कर की प्रतीक्षा में खड़े राजा के सिपाहियों के हाथ में रख दिया। जिसका आशय स्पष्ट रूप से यही समझा जा सकता था कि ऐसे निकृष्ट, और ओछे नियम को मानने से बेहतर है कि शरीर के उस भाग (स्तन) को ही कर की अदायगी के तौर पर कठोर ह्रदय वाले शासकों के समक्ष कर दिया जाए, जिसे सम्मान बचाने के सन्दर्भ में ढंकने पर ऐसी यंत्रणा दी जा रही हैं।

          नांगेली ने कुछ समय बाद ही प्राण त्याग दिए, परन्तु उस जाति विशेष की स्त्रियों में नांगेली ने एक ऐसी प्रतिरोध की ज्वाला को भड़का दिया जिसके भारी विरोध और आक्रोश के समक्ष त्रावणकोर साम्राज्य के शासक को झुकना पड़ा और इस अमानवीय नियम को समाप्त करना पड़ा। यही कारण है कि केरल के त्रावणकोर में स्त्रियों को स्तन ढंकने का अधिकार दिलाने के लिए अपने ही स्तनों को काट देने वाली वीरांगना नांगेली की यह घटना आज भी वहाँ की स्त्रियों को दमन के प्रति साहस दिखाकर  आत्मविश्वास के साथ प्रतिरोध के स्वर को मुखरित करने के लिए प्रेरित करती है।

                                                                                                                                                                                                                                                                                              - दीपाली 

                       पीएच.डी. शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय



* प्रतीकात्मक चित्र सोशल मीडिया से प्राप्त 



  

Comments

  1. अति सुन्दर रचना, 👏👏👏👏

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  2. ऐझवा जाति की नांगेली वीरांगना को सत सत नमन जिनके बलिदान की वजह से ऐझवा जाति की महिलाओं को मूलाकरम जैसे टैक्स से निज़ात मिला

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