ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत

 

चित्र : ग्रीन हाइड्रोजन प्रतीक चित्र* 

ग्रीन हाइड्रोजन क्या है?

 ग्रीन हाइड्रोज एक तरह की स्वच्छ ऊर्जा है, जो रीन्युबल एनर्जी जैसी सोलर पावर का इस्तेमाल कर पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में बांटने से पैदा होती है। बिजली जब पानी से होकर गुजारी जाती है तो हाइड्रोजन पैदा होती है। ये हाइड्रोजन कई चीजों के लिए ऊर्जा का काम कर सकती है। हाइड्रोजन बनाने में इस्तेमाल होने वाली बिजली रिन्युबल एनर्जी स्त्रोत से आती है। लिहाजा इससे प्रदूषण नहीं होता है। इसीलिए इसे ग्रीन हाइड्रोजन कहते हैं। ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य का ईंधन कहा जाता है और भविष्य में भारत ग्रीन हाइड्रोजन का हब बनेगा। ग्रीन हाइड्रोजन से कार्बन नहीं निकलता, इसका इस्तेमाल कार, बस, हवाई जहाज, जहाज, रॉकेट में किया जा सकता है। यह कम खपत में ज़्यादा चलता है, पेट्रोल डीज़ल से 3 गुना पावरफुल और अच्छा होता है। अब प्रश्न उठता है कि यह अभी तक क्यों इसका इस्तेमाल नहीं होता था? तो दिक्क्त ये है कि ग्रीन हाइड्रोजन का प्रोडक्शन बहुत महंगा है। पेट्रोल की तुलना में इसका रेट 3 गुना है। ग्रीन हाइड्रोजन 350-400 रुपए किलो के हिसाब से बिकता है। लेकिन रिलायंस, गेल, NTPC, इंडियन ऑयल, एलऐंडटी जैसी कंपनियां इसकी बड़ी यूनिट स्थापित कर रही हैं, जिससे इसका प्रोडक्शन बढ़ेगा तो लागत कम होगी।

आज भारत तथा पूरा विश्व पेट्रोल और डीज़ल से चलने वाले वाहनों का इस्तेमाल कम करने की कोशिश कर रहा है, अगर कुछ ऐसा है जो पेट्रोलियम ईंधन को रिप्लेस कर सकता है तो वो है ग्रीन हाइड्रोजन’, वैसे अब इलेक्ट्रिक कार और बाइक भी बाज़ार में आ चुकी हैं, लेकिन बैटरी को पेट्रोल से रिप्लेस नहीं किया जा सकता है। मोदी सरकार ने साल 2030 तक देश में 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करने का लक्ष्य बनाया है। नेशनल हाइड्रोजन मिशन (National Hydrogen Mission) के तहत यह पहला कदम है। पर्यावरणवादियों का दावा है कि यह ऑयल रिफाइनिंग, फर्टिलाइजर, स्टील और सीमेंट जैसे भारी उद्योगों को कार्बन मुक्त करने में मदद कर सकती है। लिहाजा ग्लोबल कार्बन उत्सर्जन में कटौती में भी ये काफी मददगार साबित होगी।


भारत की पहल :

भारत सरकार देश को ग्रीन ईंधन का हब बनाने के लिए अनेक कदम उठा रही है, इसमें सबसे बड़ी भूमिका देश के केंद्रीय परिवहन मंत्री नितीन गडकरी की है। भारत सरकार ने हाल ही में ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया बनाने के लिए नई पॉलिसी का एलान किया है। इस मिशन के तहत साल 2030 तक 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन का प्रोडक्शन करने का लक्ष्य है। वतर्मान सरकार का कहना है कि ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया भविष्य के ईंधन हैं। यह फ्यूचर में कोयला, पेट्रोलियम को रिप्लेस कर देगा। ग्रीन हाइड्रोजन बनाने वाली कंपनियां पावर एक्सचेंज से रिन्यूएबल पावर की खरीदी कर सकते हैं। इतना ही नहीं निर्माता खुद का भी रिन्यूएबल प्लांट स्थापित कर सकते हैं।

ग्रीन हाइड्रोजन का प्रोडक्शन करने के लिए जो आवेदन देगा उसे 15 दिन के परमिशन मिल जाएगी। वर्ष 2025 के पहले इसकी शुरुआत करने पर 25 साल तक के इंटर स्टेट ट्रांसमिशन ड्यूटी मिलेगी। इसके लिए एक खास वेबसाइट बनाई जाएगी। ग्रीन हाइड्रोजन बनाने वालों को बंदरगाहों में स्थान दिया जाएगा। इसके साथ ही सरकार ने अपनी ग्रीन हाइड्रोजन पॉलिसी तहत रिसर्च और दूसरी जरूरतों के लिए फंड मुहैया कराने का एलान किया है। इसके लिए सस्ती रिन्युबल एनर्जी के साथ इंटर स्टेट पावर ट्रांसमिशन के लिए 25 साल तक की छूट का प्रावधान है। हालांकि ये छूट उन्हीं परियोजनाओं को मिलेगी, जो जून 2025 के पहले शुरू हो जाएंगीं।

भारत में 2029-30 तक हाइड्रोजन की मांग 1.17 करोड़ टन पर पहुंच जाने की संभावना है। फिलहाल इसकी मांग 67 लाख टन है। इस 67 लाख टन में से लगभग 36 लाख टन यानी 54 फीसदी का इस्तेमाल पेट्रोलियम रिफाइनिंग में होता है। बाकी का इस्तेमाल फर्टिलाइजर उत्पादन में होता है। हालाँकि ये ग्रे हाइड्रोजन है जो नैचुरल गैस या नैप्था से बनाई जाती है। जाहिर है इससे काफी प्रदूषण फैलता है, जो भारत के कार्बन उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य में एक बड़ी बाधा है।

सीएनबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने ग्रीन एनर्जी उत्पादन में 75 अरब डॉलर के निवेश का ऐलान तो किया है। लेकिन कंपनी ने इसका खुलासा नहीं किया है कि वह ग्रीन हाइड्रोजन में कितना निवेश करेगी। इस साल अप्रैल में हैदराबाद की कंपनी ग्रीनको ग्रुप और बेल्जियम की कंपनी जॉन कोकरिल ने भारत में दो गीगावाट क्षमता का हाइड्रोजन इलेक्ट्रोलाइजर फैक्टरी लगाने का एलान किया था। ग्रुप की ओर से चीन के बाहर लगाई जाने वाली यह सबसे बड़ी फैक्टरी है।

मार्च में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने दो निजी कंपनियों के साथ मिल कर ग्रीन हाइड्रोजन बनाने का एलान किया था। इन कंपनियों ने ग्रीन हाइड्रोजन बनाने में इस्तेमाल होने वाली इलेक्ट्रोलाइजर बनाने का भी एलान किया है। रिलायंस और अनडानी दोनों ने दुनिया का सबसे सस्ता हाइड्रोजन बनाने का एलान किया है। इन कंपनियों का कहना है वो एक डॉलर की कीमत पर ग्रीन हाइड्रोजन बेचेंगी।

भारत में ग्रीन हाइड्रोजन की मांग और लागत?

हाइड्रोजन एक रंगहीन गैस होती है। हाइड्रोजन का ग्रीन, ब्लू, ग्रे से लेकर फिरोजी रंग इस बात पर निर्भर करता है कि ये बनाई कैसे गई है? ग्रीन हाइड्रोजन एक मात्र क्लीन एनर्जी है, जो रिन्युबल एनर्जी के इस्तेमाल से बनाई जाती है। टेरी के मुताबिक साल 2020 में भारत में जीवाश्म ईंधन से साठ लाख टन ग्रे हाइड्रोजन का उत्पादन किया गया था। 2050 तक भारत में हाइड्रोजन की मांग पांच गुना तक बढ़ जाएगी। लेकिन ग्रीन हाइड्रोजन, जीवाश्म ईंधन की तुलना में तभी लागत प्रतिस्पर्द्धी हो पाएगी जब यह 50 फीसदी सस्ती हो जाएगी।

रिन्युबल एनर्जी की भारत की कुल स्थापित ऊर्जा में 40 फीसदी हिस्सेदारी है। भारत, चीन और अमेरिका के बाद कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है। लेकिन बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण के बगैर रिन्युबल एनर्जी पारंपरिक ऊर्जा स्त्रोतों का विकल्प नहीं बन सकती। कहने का मतलब ये है कि रिन्युबल एनर्जी के लिए स्टोरेज क्षमता विकसित करना जरूरी है, तभी इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो सकता है। लिथियम बैटरियाँ बड़े पैमाने पर ऊर्जा का भंडारण नहीं हो सकती। हालांकि इलेक्ट्रिक वाहनों में फिलहाल इसका खूब इस्तेमाल हो रहा है।

प्रमुख चुनौतियां :

भारत में ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल तभी बढ़ेगा जब इसका उत्पादन सस्ता होगा। यानी स्टील, सीमेंट और वाहन उद्योग इसका इस्तेमाल तभी करेंगे, जब यह उनकी लागत को नियंत्रण में रखेगा। फिलहाल ग्रीन हाइड्रोजन से बनाए जाने वाला स्टील पारंपरिक ईंधन से बनाए जाने वाले स्टील से 50 से 127 फीसदी महंगा हो जाएगा।

इस वक्त भारत में हाइड्रोजन की कीमत 340 रुपये से 400 रुपये प्रति किलो है। अगर ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल इंडस्ट्री में तभी बढ़ेगा, जब इसकी कीमत 150 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाएगी। रिफाइनरी, फर्टिलाइजर और स्टील उद्योग हाइड्रोजन के सबसे बड़े उपभोक्ता है। इन उद्योगों के अलावा बिजली उत्पादन, हाइड्रोजन स्टोरेज और मोबिलिटी इंडस्ट्री (बैटरी से चलने वाली कारों, रेल, ट्रक बस, और जलपोत) में भी सस्ते हाइड्रोजन उत्पादन को लेकर आरएंडडी गतिविधियां बढ़ गई हैं।

 


* उपरोक्त चित्र navbharattimes.indiatimes.com से प्राप्त 

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