प्रतिरोध : मनोज कुमार

 जंग लग चुके इस जहा में,

अब कहीं परिरोध नज़र नहीं आता।
वो आग नज़र नहीं आती, 
वो ग़ुबार नज़र नहीं आता, 
चारों तरफ देखने पर भी वो देहखता अँगार नज़र नहीं आता।
नज़र आते हैं तो सिर्फ थके हारे, लाचार, बेबस,
अपनी ही लाचारी का रोना रोते,
अपनी खो में छुपे,
व्यवस्था का झुनझुना बन चुके,
सिर्फ हाड़ मांस के लूथरे।
जो किसी भी वक्त बिक जाने को तैयार हैं,
इस बाज़ारीकरण के दौर में।
सब कुछ बिक रहा है इस बाजार में
संवेदनाएं, भावनाएं, मौत, दर्द, चीख का बाजार चारों ओर बिछा है।
लेकिन कहीं दूर देखने पर एक चिंगारी नज़र आती है,
ये चिंगारी है जंगलों के आग की,
जो निरतंर एक लंबे इतिहास को अपने में समेटे हुए है, 
जिंदा रखे हुए है प्रतिरोध की अपनी चेतना को। 
जो एहसास दिलाती है कि हमारा अस्तित्व तभी तक है जब तक हम प्रतिरोध कर सकेंगे। 
अन्यथा हम भी औरों की तरह केवल हाड़ मांस के लूथ्ड़े बन कर रह जायेंगे।
और मिटा दिये जायेंगे सदा-सदा के लिए भूत, वर्तमान व भविष्य से।
हम सिर्फ इतिहास होंगे, लेकिन इतिहास के पन्नों पर हमारे नाम की स्याही तक न होगी।

                                                                   - मनोज कुमार 

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