बदलता शहर : मनोज कुमार

 देखते ही देखते

कितना बदल गया ये शहर,

आसमा अभी भी वही है
मगर न जाने
धूल में कहां उड़ गया ये शहर,
घर के पास का पीपल
अब खामोश सहमा हुआ रहता है,
शायद वो डरा हुआ है
क्योंकि खो दिया है
उसने चिड़ियाओं की चहचाहट को,
कई दिनों से कोई
चिड़िया उसकी टहनी पर नहीं आयी,
अब आते हैं तो सिर्फ गिद्ध और बाज
जो उस पीपल पर
टेडी नज़र बनाये हुए हैं,
शायद चुभता है उनकी
आँखों में ये वृक्ष,
विकास के नरभक्षी
घूम रहे हैं शहर में चारों ओर
उन्हें कोई नदी, 
तालाब या  पेड़
रास नहीं आता।
ये वही शहर है
जिसने कभी कोई दंगा नहीं देखा था,
पर एकाएक न जाने
क्या हुआ इस शहर को
पहले तो इसने अपना नक्सा बदला
और अब इंसा को।
और अब देखते ही देखते
सड़कों का रंग भी बदल गया।
कच्ची थी तो अच्छी थी ये सड़क
जब से पक्की हुई है, सन चुकी है खून से।
आज इस शहर में
न जाने क्यों एक घुटन सी होती है।
मंदिर की घंटी, मस्जिद की अजान,
पुलिस की गाड़ियों के सायरन में
मानों दब से गये हैं।
सच कहूं तो
अब अंदर ही अंदर
न जाने, कैसा एक भय पलता है
अपने अस्तित्व को लेकर।
और दूर तक देखने पर
अपना कोई नज़र
नज़र नहीं आता।
सिवाय इस वृक्ष के,
देखते मेरी ही तरह चुप चाप
डरा सहमा हुआ खड़ा है।
देखते ही देखते
कितना बदल गया
ये शहर...।

                            - मनोज कुमार 

Comments

  1. देखते देखते जितना यह शहर बदला है, उतना ही बदला है इंसान।
    शहर का ढांचा यहाँ जैसे है इंसान।
    घर के बंद दरवाजों के पीछे, है शहरी अकेलेपन से सिसकता इंसान।

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