बेरोजगार : भूपेंद्र रावत

बेरोजगार हूँ, 
अब,लोगों से मिलने से 
डरता हूँ।
रोज़गार की तलाश में 
हर रोज़ 
दर बदर भटकता हूँ।
क्यों,कहाँ,कब,कैसे
अब जीवन का 
एक हिस्सा है।
रोज़गार के सिवा
न कोई और इच्छा है।
रोज़गार शब्द में
"बे" नाम का उपसर्ग
बड़ा निक्कमा है।
अब तो लगता है,जैसे
आत्मा का बोझ धोने पर 
शरीर भी शर्मिंदा है।

                         - भूपेंद्र रावत

Comments

  1. बेरोज़गार लोगों की एक ही व्यथा है
    दुनिया क्या जाने रोज़गार की तलाश में
    बेरोजगार शख्स कैसे तन्हा जीता है।

    ReplyDelete
  2. बेरोजगारी में रोजगार की चाह लिए जब व्यक्ति भटकता है।
    कोई और क्या जाने...
    तब उस व्यक्ति का दिल अनचाहे ही कितना तड़पता है।

    ReplyDelete

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