भारतीय साहित्य में विभाजन का दर्द


 

15 अगस्त 1947, के दिन जब देश 200 साल की अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हुआ, तो जहां एक ओर देश के आज़ाद होने की खुशी थी, तो वहीं दूसरी तरफ विभाजन का दर्द भी भारत के नसीब में लिखा जा चुका था। स्वतंत्रता मिलने के साथ ही देश के दो टुकड़े हो गए। भारत का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा कटकर एक नया देश पाकिस्तान बना। राजधानी दिल्ली एक तरफ आज़ादी का जश्न मनाने के लिए तैयार हो रही थी। लाल किले पर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रीय ध्वज फहराकर देश के स्वाधीन होने की घोषणा की। एक तरफ देश आज़ादी का जश्न मना रहा था, तो वहीं दूसरी ओर देश का एक हिस्सा धू-धू कर जलने लगा। हिन्दुस्तान बंटवारे की त्रासदी से गुजर रहा था। खुशी का मौका पलभर में खून और दहशत में बदल गया था। कम से कम डेढ़ करोड़ लोग अपना घर-बार छोडने पर मजबूर हो गए। इस दौरान हुई लूटपाट, बलात्कार और हिंसा में कम से कम पंद्रह लाख लोगों के मरने और अन्य लाखों लोगों के घायल होने का अनुमान है. बंटवारे में न सिर्फ देश को बांटा गया बल्कि लोगों के दिल भी बांटने की  कोशिश की गयी।  विभाजन  के इसी दर्द को भारतीय साहित्यकारों ने समय-समय पर अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान करने का कार्य किया। 

 

झूठा सचयशपाल :

 हिंदी के प्रसिद्ध लेखक यशपाल का उपन्यास है जो भारत विभाजन पर अपने महाकाव्यात्मक स्वरूप में इस त्रास का उदघाटन करता है। झूठा सच दो भागों में लिखा गया है - 'वतन और देश', तथा 'देश का भविष्य'। उपन्यास की नायिका तारा का संघर्ष और दूसरे चरित्रों के मार्फ़त सामाजिक परिवर्तन को देखा गया है। कहा जा सकता है कि विभाजन का जैसा औपन्यासिक दस्तावेजीकरण यशपाल ने इस उपन्यास में संभव किया है वह किसी भी भाषा के लिए गौरव की बात है।


तमसभीष्म साहनी :

भीष्म साहनी ने उपन्यास के संदर्भ में लिखा है कि आजाद भारत में हुए दंगों के कारण उन्हें अपने शहर रावलपिंडी के दंगे याद आए जिनकी आग गांवों तक फैल गई थी। 1986 - 87 में दूरदर्शन पर आए फिल्मांकन के कारण यह उपन्यास एकाएक चर्चित हो उठा था, लेकिन उसकी असली ताकत दंगों और घृणा के घनघोर अन्धकार में भी मनुष्यता के छोटे-छोटे सितारे खोजने में है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसकी कथा विभाजन से पहले की है, लेकिन इसकी सफलता और सार्थकता इस बात में है कि यह विभाजन के मूल कारणों की पड़ताल करने में पाठक को विवेकवान बनाता है।

 

सूखा बरगदमंजूर एहतेशाम :

कथाकार मंज़ूर एहतेशाम का नब्बे के दशक में लिखा उपन्यास 'सूखा बरगदअसल में स्वातंत्र्योत्तर भारत में विभाजन के परिणामस्वरूप आए सामुदायिक जीवन के बदलाव की कथा कहता है। इसके केंद्र में भारतीय मुस्लिम समाज है जिसके अंतर्विरोध और द्वंद्व उपन्यासकार ने बेहद मार्मिक ढंग से उद्घाटित किए हैं। एक मामूली आदमी जो विभाजन को अपने मन में कभी स्वीकार नहीं करता और धार्मिक कट्टरता से दूर उसके लिए पाकिस्तान एक अजनबी देश है लेकिन तब भी उसे साम्प्रदायिक मनोवृत्ति के लोगों से जूझना पड़ रहा है। असल में भारतीय सामुदायिक जीवन की बरगद जैसी बहुलता के सूखते जाने का मर्सिया है -सूखा बरगद।

 
जिस लाहौर नइ वेख्याअसगर वजाहत :

यह भारत विभाजन की एक घटना पर आधारित  उपन्यास है। भारत से पाकिस्तान गए एक मुस्लिम परिवार को एक हिन्दू परिवार की कोठी मिली है और उसमें रहने वाली बुढ़िया भारत जाने को तैयार नहीं जबकि उसके घरवाले सब चले गए हैं। धीरे-धीरे नाटक में तनाव बढ़ता है और विभाजन से उपजी कट्टरता (या कट्टरता से हुए विभाजन) के कारण वहां बुढ़िया की स्थिति बेहद उलझन पैदा कर देती है। समाज में मौजूद कट्टर और धर्म का धंधा कर रहे लोग स्थितियों को बिगाड़ते हैं। तब भी असगर वजाहत उस निराशा और अंधकार में मनुष्यता और सद्भावना का उजास खोज लाते हैं। 

 

गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तानकृष्णा सोबती :

कृष्णा सोबती कृत उपन्यास "गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान” भी भारत-पाकिस्तान के विभाजन की त्रासदी को अभिव्यक्त करती है। यह किताब खून से सने उस अतीत की बात कहती है जो अतीत भारत और पाकिस्तान दोनों ही मुल्कों से जुड़ा है। इस किताब में उनके पाकिस्तान-स्थित पंजाब के गुजरात से विस्थापित होकर पहले दिल्ली में शरणार्थी के रूप में आने और फिर भारत-स्थित गुजरात के सिरोही राज्य में वहां के राजकुमार की गवर्नेस के रूप में नौकरी करने की कहानी है। इस उपन्यास में एक पंक्ति है जिसमें कहा गया है,''घरों को पागलखाना बना दिया सियासत ने'' यह छोटी सी पंक्ति विभाजन के पूरे त्रासदी को बयां करने के लिए काफी है। उपन्यास में जब-तब सोबती विभाजन की दुखती रग छेड़ती रहती हैं। कभी अकेले ही तो कभी किसी के मिलने पर पुरानी यादें घेरकर टीसने लगती हैं। ऐसी ही एक कमजोर घड़ी में बिस्तर पर लेटी हुई कृष्णा को शरणार्थी शिविर किंग्सवे कैंप की याद आने लगती हैं। वह लिखती हैं

''ध्यान में किंग्सवे कैम्प की रील खुलने लगी। तम्बुओं की कतारें। अन्दर-बाहर लुटे-पिटे-घायलबीमारशरणार्थी। बेबसी में भटकते खौलते। कभी सिसकियांकभी हिचकियां। और कभी बंटवारे पर राजी होने वालों को गालियां! -अरे बैरियोंतुम पर गाज गिरे। तुम्हारे खेत-खलियानों पर कहर पड़े। अरे तुम्हारी नस्लें नष्ट होंजैसे तुमने हमें हमारे घरों से उखाड़ा! नौजवान लड़के-लड़कियों की टोली अपनी-अपनी ड्यूटी पर तैनात हो रही है।''

 

आधा गांव,  राही मासूम राजा :

राही मासूम राजा द्वारा लिखित 'आधा गांव'  उपन्यास विभाजन से पहले की घटनाओं और इसके कारण सामाजिक ताने-बाने के छिन्न-भिन्न होने की प्रक्रिया को पाठकों के सामने लाता है। शिया मुसलमानों पर केंद्रित उपन्यास स्वाधीनता आंदोलन तथा देश विभाजन का ऐतिहासिक साक्ष्य है। मूलतः यह एक आंचलिक उपन्यास है जो उत्तर प्रदेश के गंगोली गांव (जिला -गाजीपुर ) के भौगोलिक सीमा के इर्द गिर्द बुना गया है। आधा गांव ऐतिहासिक दस्तावेज़ है तत्कालीन राजनीतिक यथार्थ की अभिव्यक्ति हुई है।

भौगोलिकता के लिहाज़ से इसे आंचलिक उपन्यास की श्रेणी में ही रखा जाता है पर विभाजन के समय मुसलमानों की सब जगह यही स्थिति थी चाहे गंगौली का हो या लखनऊ का। उपन्यास का अंश देखिए' "कहीं इस्लामे के हुक़ूमत बन जैयहे ! ऐ भाईबाप-दादा की कबर हियां हैचौक इमामबाड़ा हियां है ,खेत -बाड़ी हियां है। हम कोनो बुरबक हैं कि तोरे पकिस्तान ज़िंदाबाद में फंस जायं !"

 

ट्रेन टू पाकिस्तान, (पाकिस्तान मेल),खुशवंत सिंह :

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कहानी के केंद्र में ट्रेन है। पाकिस्तान की ओर जा रही है। विभाजन का दौर है। दंगे का माहौल है। फिल्म में विभाजन के दौरान मानव मन में बैठे दर्दडर और चिंता को अभिव्यक्त किया गया है।

 

 सिक्का बदल गया(हिंदी कहानी)कृष्णा सोबती :

कृष्णा सोबती अपने उपन्यासों के लिए चर्चित हैं लेकिन विभाजन पर लिखी उनकी कहानी 'सिक्का बदल गयासमस्या के एक पक्ष का प्रामाणिक और मार्मिक पाठ तैयार करती है। पाकिस्तान के एक मुस्लिम बहुल गांव में अकेली हिन्दू बची शाहनी की कथा एक खुद्दार और अपराजेय मनुष्य गाथा भी है। गांव की सेठानी को गांव के लोग गांव छोड़ने के लिए मजबूर कर रहे हैं। वह गांव छोड़कर कैंप जाती है लेकिन बिना कातर हुए। मुड़कर नहीं देखती। धार्मिक कट्टरता से उपजी घृणा के मध्य शाहनी का वीरता व्यक्तित्व सन्देश देता है कि मनुष्य को कोई कट्टरता झुका नहीं सकती।

 

शरणदाता(हिंदी कहानी)अज्ञेय :

'शरणदाताअज्ञेय की कहानी है। कवि अज्ञेय की कहानी। यथार्थवादी बुनियाद पर लिखी इस कहानी में देविन्दरलाल जी को घर छोड़कर जाने से रफ़ीकुद्दीन साहब रोक लेते हैं। उन्माद और तनाव के घनघोर आतंक के बीच देविन्दरलाल उनके मकान में एक सूने कोने में शरण लिए हुए हैं। हिंसा से बचकर आए देविन्दरलाल जी को यहां भी जहर दिया जाता है। लेकिन वे मरते नहीं। क्योंइस घृणा और हिंसा में भी उनके जीवन को बचाने वाला कोई है।


मलबे का मालिक(हिंदी कहानी)मोहन राकेश :

मोहन राकेश की कहानी 'मलबे का मालिकविभाजन की घटना का इधर वाला पाठ है। अमृतसर गनी मियां को घर छोड़ पाकिस्तान जाना पड़ा था। पीछे रह गए परिवार को मोहल्ले के लोगों ने 'पाकिस्तानदे दिया। अब गनी मियां का घर मलबा बन चुका है और वे हॉकी मैच देखने के बहाने आए हैं। कृष्णा सोबती की शाहनी की आंख में कातरता और आंसू नहीं हैं तो यह कहानी गनी मियां के अमिट विश्वास की गाथा है। जिस मोहल्ले में उनका परिवार था वहां कैसे उनके बेटे को मारा जा सकता है। वे पहलवान से ही पूछते हैं और हत्यारा पहलवान खामोश है। यह पराजय की खामोशी है और गनी मियां के आंसू मनुष्यता का वह अवसाद जो हमें बेचैन करता है कि आखिर धर्म की कट्टरता क्यों आदमखोर बन जाती है?

 

आधी रात की संतानेंसलमान रुशदी :

सलमान रुश्दी ने अपने इस उपन्यास में एक युवा लड़के की कहानी के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता की आकर्षक कहानी बताई है। आपको बता दें कि सलमान रूश्दी का ये उपन्यास 20 वीं शताब्दी के सबसे सफल उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास में नायक सलीम सिनाई आधी रात में ठीक उसी समय पैदा हुए हैं जब भारत ने आजादी हासिल की थी। इस कहानी में ये भी बताया कि उस समय पैदा हुए उन सभी बच्चों के पास कुछ खास शक्तियां भी भगवान से गिफ्ट के तौर पर मिली हैं। इन बच्चों ने लेखक ने खुद को भी शामिल किया है और सभी बच्चों को एक साथ इकट्ठा किया है।

 ‘गद्दार’ (उर्दू), कृष्ण चंदर :

उनकी कहानी ‘पेशावर एक्सप्रेस’ भारत-पाक बंटवारे की दर्दनाक दास्तां को बयां करती है। इस कहानी में उन्होंने बड़े ही खूबसूरती से इस ख्याल को पिरोया है,‘‘कब आदमी के भीतर का शैतान जाग उठता है और इंसान मर जाता है।’’

 

बस्ती(उर्दू), इंतेजार हुसैन :

उपन्यास ‘बस्ती’ मे बिभाजन के बाद सीमा पार के एक संवेदनशील व्यक्ति के बहाने उपन्यासकार नियति से जुड़े कई मूल सवालों से मुठभेड़ करता है। बस्ती 1979 मे लिखी गयी और कहानी की जमीन 1971के युद्ध के महौल की है। जब पाकिस्तान से बहुत उम्मीदे नहीं रह गयी थी। पूर्वी पाकिस्तान से विचलित कर देने वाली खबरे आ रही थी। कहानी का जो नायक है पहले ही 1947 का कोलाहल और मार-काट का चश्मदीद रह चुका है एवं भारत छोड़ कर पाक जमीन पे पलायन कर चुका है। जब पाकिस्तान मे रहने लगता है तो उसे पहली रात नींद नहीं आती है। वह अपने पुराने दिनों को याद करता है। वह भारत के बस्ती और पाकिस्तान की बस्ती मे अंतर देखता है। अपने बचपन को याद करने से उपन्यास की शुरुआत होती है। जहा शांति है और हिन्दू और मुसलमान सब एक ही बस्ती मे रहते है। वह कितना सुहान दिन था-जब दुनिया अभी नयी-नयी थीजब आसमान ताजा था और जमीन अभी मैली नहीं हुयी थीजब दरख्त सदियो मे सांस लेते थेऔर परिंदो की आवाजों मे जुग बोलते थेकितना हैरान होता था वह इर्द-गिर्द को देखकर की हर चीज कितनी नयी थी और कितनी पुरानी नजर आती थी।” लेकिन दुनिया मे अब वो दिन नहीं रहे जमीन का बटवारा हो गया पर हवा और आसमान नहीं बटे है। 

 

 ‘उदास नस्लें(उर्दू)अब्दुल्ला हुसैन :

लेखक अब्दुल्लाह हुसैन के इस उपन्यास की विशेषता यह है कि इसका कथानक विभाजन और विस्थापन तक सीमित नहीं हैबल्कि अन्य कई प्रकार की अस्मिताओं की टकराहट इसमें देखी जा सकती है। भारतीय उपमहाद्वीप के परम्परागत समाज के आधुनिक समाज में तब्दील होने की ज़द्दोज़हद इसके केन्द्र में है। उपन्यास का कथानक प्रथम विश्वयुद्ध के कुछ पूर्व से विभाजन और उसके पश्चात् की घटनाओं और उपद्रवों के समय तक फैला हुआ है। विशाल कैनवस वाला यह उपन्यास तीन युगों का दस्तावेज़ है। पहला अंग्रेज़ी साम्राज्य का युगदूसरा स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष का काल और तीसरा विभाजन के पश्चात् का ज़माना। इसमें हिन्दुस्तान में बसने वाली कई पीढ़ियों के साथ बदलते हुए ज़मानों का चित्रण है और समाजसभ्यता तथा राजनीति की पृष्ठभूमि में बदलती हुई सोच का भी। ‘उदास नस्लें’ का नायक कोई व्यक्ति न होकरसमकालीन जीवन के विभिन्न कालखंड और उनसे गुज़रते हुए संघर्ष तथा व्यथा के भँवर में घिरी तीन पीढ़ियाँ हैं। इतिहास का ताना-बाना उन्हीं के अनुभवों के इर्द-गिर्द बुना गया है। इसमें शहरी तथा ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले दो परिवारों की कथा है। नईम और अज़रा दो भिन्न समाजों और मानसिक और भावात्मक सरोकार के दो विपरीत पक्षों के प्रतिनिधि हैं। उनके बीच प्रक्रिया और प्रतिव्रि$या का सिलसिला जारी रहता है। वे दोनों अपनी जड़ों से तो नहीं कट सकते क्योंकि वे उनके संस्कारों का हिस्सा बन चुकी हैंफिर भी एक प्रकार के कायाकल्प की प्रक्रिया से वे ज़रूर गुज़रते हैं। नईम अपने स्वभाव और मूल वृत्तियों से धरती का बेटा हैपरन्तु अज़रा के माध्यम से उसका परिचय उस जीवन से होता है जो किसी हद तक परम्परागत मान्यताओं के अनुरूप नहीं है। नईम और अज़रा की आपसी निष्ठा और आत्मीयता में प्रेम का तत्त्व उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना दो अस्मिताओं में एकत्व पैदा करने और उनके अंदर विस्तार तलाश करने की भावना। परन्तुअंत में उसकी पराजय हृदयविदारक है। अब्दुल्लाह हुसैन इन दिनों लाहौर (पाकिस्तान) में रहते हैं। उनका यह बहुचर्चित उपन्यास पहली बार पाकिस्तान में 1963 में छपा था। 1964 में इसे आदम जी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

टोबा टेक सिंह, सआदत हसन मंटो :

इस कहानी में प्रवासन की पीड़ा को विषय बनाया गया है। देश विभाजन के बाद जहां हर चीज़ का आदान-प्रदान हो रहा था वहीं क़ैदीयों और पागलों को भी स्थानान्तरित करने की योजना बनाई गई। फ़ज़लदीन पागल को सिर्फ़ इस बात से सरोकार है कि उसे उसकी जगह 'टोबा टेक सिंहसे जुदा न किया जाये। वो जगह चाहे हिन्दुस्तान में हो या पाकिस्तान में। जब उसे जबरन वहां से निकालने की कोशिश की जाती है तो वह एक ऐसी जगह जम कर खड़ा हो जाता है जो न हिन्दुस्तान का हिस्सा है और न पाकिस्तान का और उसी जगह पर एक ऊँची चीख़ के साथ औंधे मुँह गिर कर मर जाता है।

आख़िरी सल्यूट, सआदत हसन मंटो :

हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद कश्मीर के लिए दोनों मुल्कों में होने वाली पहली जंग के दृश्यों को प्रस्तुत किया गया है कि किस तरह दोनों देश की सेना भावनात्मक रूप से एक दूसरे के अनुरूप हैं लेकिन अपने-अपने देश के संविधान और क़ानून के पाबंद होने की वजह से एक दूसरे पर हमला करने पर विवश हैं। वही लोग जो विश्व-युद्ध में एकजुट हो कर लड़े थे वो उस वक़्त अलग-अलग देश में विभाजित हो कर एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो गए।

टेटवाल का कुत्ता, सआदत हसन मंटो :

कहानी में मुख्य रूप से हिन्दुस्तानियों और पाकिस्तानियों के बीच की धार्मिक घृणा और पूर्वाग्रह को दर्शाया गया है। कुत्ता जो कि एक बेजान जानवर हैहिन्दुस्तानी फ़ौज के सिपाही केवल मनोरंजन के लिए उस कुत्ते का कोई नाम रखते हैं और वह नाम लिख कर उसके गले में लटका देते हैं। जब वो कुत्ता पाकिस्तान की सरहद की तरफ़ आता है तो पाकिस्तानी सैनिक उसे कोई कोड-वर्ड समझ कर सतर्क हो जाते हैं। दोनों तरफ़ के सैनिकों की ग़लत-फ़हमी के कारण उस कुत्ते पर गोली चला देते हैं।

यज़ीद, सआदत हसन मंटो :

करीम दादा एक ठंडे दिमाग़ का आदमी है जिसने तक़सीम के वक़्त फ़साद की तबाहियों को देखा था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान जंग के तानाज़ुर में यह अफ़वाह उड़ती है कि हिन्दुस्तान वाले पाकिस्तान की तरफ़ आने वाले दरिया का पानी बंद कर रहे हैं। इसी बीच उसके यहाँ एक बच्चे का जन्म होता है जिसका नाम वह यज़ीद रखता है और कहता है कि उस यज़ीद ने दरिया बंद किया थायह खोलेगा।

अंजाम बख़ैर, सआदत हसन मंटो :

विभाजन के दौरान हुए दंगों में दिल्ली में फँसी एक नौजवान वेश्या की कहानी है। दंगों में क़त्ल होने से बचने के लिए वह पाकिस्तान जाना चाहती हैलेकिन उसकी बूढ़ी माँ दिल्ली नहीं छोड़ना चाहती। आख़िर में वह अपने एक पुराने उस्ताद को लेकर चुपचाप पाकिस्तान चली जाती है। वहाँ पहुँचकर वह शराफ़त की ज़िंदगी गुज़ारना चाहती है। मगर जिस औरत पर भरोसा करके वह अपना नया घर आबाद करना चाहती थीवही उसका सौदा किसी और से कर देती है। वेश्या को जब इस बात का पता चलता है तो वह अपने घुँघरू उठाकर वापस अपने उस्ताद के पास चली जाती है।

सहाय, सआदत हसन मंटो :

भारत विभाजन के परिणाम स्वरूप होने वाले दंगों और उनमें मानव रक्त की बर्बादी को बयान करती हुई कहानी है। जिसमें एक हिंदू नौजवान (जो बंबई में रहता है) के चचा का कराची में क़त्ल हो जाता है तो वो मुसलमान दोस्त से कहता है कि अगर यहाँ फ़साद शुरू हो गए तो मुम्किन है कि मैं तुम्हें क़त्ल कर डालूं। इस जुमले से मुसलमान दोस्त को बहुत सदमा पहुँचता है और वो पाकिस्तान चला जाता है )लेकिन जाने से पहले वो सहाय नामी दलाल की कहानी सुनाता है जो हर तरह के धार्मिक पूर्वा-ग्रहों से मुक्त सिर्फ़ एक इंसान था। (ये मंटो के साथ पेश आने वाली वास्तविक घटना पर आधारित कहानी है।

 ख़ुदा की क़समसआदत हसन मंटो :

विभाजन के दौरान अपनी जवान और ख़ूबसूरत बेटी के गुम हो जाने के ग़म में पागल हो गई एक औरत की कहानी। उसने उस औरत को कई जगह अपनी बेटी को तलाश करते हुए देखा था। कई बार उसने सोचा कि उसे पागलख़ाने में भर्ती करा देपर न जाने क्या सोच कर रुक गया था। एक दिन उस औरत ने एक बाज़ार में अपनी बेटी को देखापर बेटी ने माँ को पहचानने से इनकार कर दिया। उसी दिन उस व्यक्ति ने जब उसे ख़ुदा की क़सम खाकर यक़ीन दिलाया कि उसकी बेटी मर गई हैतो यह सुनते ही वह भी वहीं ढेर हो गई।

माई नानकी, सआदत हसन मंटो :

इस कहानी में भारत विभाजन के परिणाम-स्वरूप पाकिस्तान जाने वाले प्रवासियों की समस्या को बयान किया गया है। माई नानकी एक मशहूर दाई थी जो पच्चीस लोगों का ख़र्च पूरा करती थी। हज़ारों की मालियत का ज़ेवर और भैंस वग़ैरा छोड़कर पाकिस्तान आई लेकिन यहाँ उसका कोई हाल पूछने वाला नहीं रहा। तंग आकर वो ये बद-दुआ करने लगी कि अल्लाह एक बार फिर सबको प्रवासी कर दे ताकि उनको मालूम तो हो कि प्रवासी किस को कहते हैं।

शहीद-साज़, सआदत हसन मंटो :

यह गुजरात के एक बनिये की कहानी है जो विभाजन के बाद पाकिस्तान जाकर अलॉटमेंट का धंधा करने लगता है। इस धंधे में उसने काफ़ी दौलत कमाई थी। इसी बीच उसे ग़रीबों की मदद करने का ख़याल आया। इसके लिए उसने कई तरह की तरकीबें सोचींपर सब बेसूद। आख़िर में उसने एक मौलाना की तक़रीर सुनी जो भगदड़ में मरने वालों को शहीद बता रहा था। मौलाना की उस तक़रीर का उस पर ऐसा असर हुआ कि उसने लोगों को शहीद करने का ठेका ले लिया।

मूत्री, सआदत हसन मंटो :

इस कहानी में देश विभाजन से ज़रा पहले की स्थिति को चित्रित किया गया है। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों के विरुद्ध मूत्रालय में अलग-अलग जुमले लिखे मिलते थे। मुसलमानों की बहन का पाकिस्तान मारा और हिंदुओं की माँ का अखंड हिन्दुस्तान मारा के नीचे लेखक ने दोनों की माँ का हिन्दुस्तान मारा लिख कर ये महसूस किया था कि एक लम्हे के लिए मूत्री की बदबू महक में तब्दील हो गई है।

                                                                                           

 

 

संदर्भ : rekhta.org/stories

 

 

 

 

 


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