भारत का सेमीकंडक्टर मिशन

भारत का सेमीकंडक्टर मिशन

चित्र : सेमी-कंडक्टर*

सिलिकॉन से बनी इस बेहद छोटी चिप की अहमियत का अहसास तब होता है, जब दुनिया भर में गाड़ियों का प्रोडक्शन थम जाता है, मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट महंगे हो जाते हैं, डेटा सेंटर डगमगाने लगते हैं, घरेलू अप्लायंस के दाम आसमान छूने लगते हैं, नए एटीएम लगने बंद हो जाते हैं और अस्पतालों में ज़िंदगी बचाने वाली टेस्टिंग मशीनों का आयात रुक जाता है। कोविड के उफान के दिनों में जब इन सेमीकंडक्टर्स या माइक्रोचिप्स की सप्लाई धीमी हो गई थी तो दुनिया भर के लगभग 169 उद्योगों में हड़कंप मच गया था। दिग्गज कंपनियों के अरबों डॉलरों का नुकसान उठाना पड़ा था। चीन, अमेरिका और ताइवान जैसे माइक्रोचिप्स के सबसे बड़े निर्यातक देशों की कंपनियों को भी प्रोडक्शन रोकना पड़ा था।

इसी महीने (मई 2022) कार बनाने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी मारुती सुज़ुकी ने बताया कि सेमीकंडक्टर की कमी से अप्रैल महीने में उसे डेढ़ लाख कारें कम बनानी पड़ीं। रुस और यूक्रेन की जंग ने इस संकट को और गहरा कर दिया है, क्योंकि रूस सेमीकंडक्टर माइक्रोचिप्स बनाने में इस्तेमाल होने वाली धातु पैलेडियम का सबसे बड़े सप्लायरों में शुमार है, जबकि यूक्रेन नियोन गैस के सबसे बड़े सप्लायरों में से एक है। सेमीकंडक्टर को 'न्यू ऑयल' कहा जा रहा है। भारत डिजिटलाइजेशन के हाई वे पर दौड़ रहा है लेकिन इसके लिए ज़रूरी 'ऑयल' बाहर से मंगाया जाता है। भारत में तेज़ डिजिटलाइज़ेशन का दौर है। लिहाजा माइक्रोचिप्स की मांग भी तूफ़ानी रफ्तार से बढ़ रही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के निवेशकों को आमंत्रित करते हुए कहा, '' भारत में 2026 तक 80 अरब डॉलर के सेमीकंडक्टर की खपत होने लगेगी और 2030 तक ये आंकड़ा 110 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा।'' भारत की विडंबना ये है कि दुनिया की लगभग सभी नामी-गिरामी चिप कंपनियों के यहां डिज़ाइन और आरएंडडी सेंटर हैं। लेकिन चिप बनाने वाले फैब्रिकेशन प्लांट या फैब यूनिट नहीं हैं।

भारत के इंजीनियर इंटेल, टीएसएमसी और माइक्रोन जैसी दिग्गज चिप कंपनियों के लिए चिप डिज़ाइन करते हैं। सेमीकंडक्टर प्रोडक्ट की पैकेजिंग और टेस्टिंग भी होती है। लेकिन चिप बनाए जाते हैं अमेरिका, ताइवान, चीन और यूरोपीय देशों में। चिप्स बनाने वाली फैब्रिकेशन प्लांट यानी फैब यूनिट्स (इक्का-दुक्का कंपनियों को छोड़ कर) का यहां न होना भारत के सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन की सबसे कमज़ोर कड़ी है। इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट के एक बड़े उपभोक्ता देश के तौर पर उभर रहे भारत के लिए माइक्रोचिप के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भरता कम चिंताजनक नहीं है।

देश में पेट्रोल और गोल्ड के बाद सबसे ज़्यादा आयात इलेक्ट्रॉनिक्स का होता है। फरवरी 2021 से अप्रैल 2022 के बीच इसके 550 अरब डॉलर के आयात बिल में अकेले इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम की हिस्सेदारी 62.7 अरब डॉलर की थी। इसमें से लगभग 15 अरब डॉलर यानी 1.20 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का आयात सिर्फ सेमीकंडक्टर का ही होता है।

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए ये एक बड़ा बोझ है, जो पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस के बढ़ते दाम की वजह से भारी दबाव में है। लिहाजा भारत सेमीकंडक्टर के मामले में अब पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में लग गया है। मोदी सरकार सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का एक हिस्सा (जैसे चिप डिज़ाइन) भर बन कर संतुष्ट नहीं है। वो देश में पूरा सेमीकंडक्टर इको-सिस्टम खड़ा करना चाहती है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या भारत के पास अपने सेमीकंडक्टर मिशन को पूरा करने की क्षमता है?

बेंगलुरू में हाल में हुए सेमीकंडक्टर कॉन्फ्रेंस सेमीकॉन में इंटेल, माइक्रोन, ग्लोबल फाउंड्रीज, टीएसएमसी और केडेंस जैसी दिग्गज चिप कंपनियां मौजूद थीं। सबने माना कि भारत में एक ग्लोबल चिप पावरहाउस बनने की क्षमता है। लेकिन अभी तक इनमें से किसी भी कंपनी ने यहां निवेश का औपचारिक एलान नहीं किया है।

माइक्रो चिप की बढ़ती अहमियत और इसकी कमी को देखते हुए पूरी दुनिया में इस वक्त ग्लोबल चिप कंपनियों को इंसेंटिव देने की होड़ मची है। अमेरिका ने 52 अरब डॉलर के इंसेंटिव का एलान है। पिछले साल इसने तीन साल में 55 से 65 अरब डॉलर के इंसेंटिव देने का एलान किया। चीन 2025 तक 150 अरब डॉलर और यूरोपीय संघ 20 से 35 अरब डॉलर का इंसेंटिव देगा।

ऐसे में भारत का 10 अरब डॉलर का इंसेंटिव कहां टिकता है? इस साल ग्लोबल चिप कंपनियां लगभग 150 अरब डॉलर का निवेश कर रही हैं। इन्सेंटिव के इन आंकड़ों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये कंपनियां कहां पैसा लगाएंगीं। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल में बेंगलुरू में हुए सेमीकंडक्टर कॉन्फ्रेंस में माना कि सेमीकंडक्टर इको-सिस्टम 100 मीटर की रेस नहीं एक मैराथन है। भारत का 10 अरब डॉलर का इन्सेंटिव कोई कम नहीं है। एक ऐसे देश के लिए जो इस मैराथन में देर से शामिल हो रहा है और जिसमें कई दिग्गज दौड़ने वाले पहले से मौजूद हों, उसके लिए ये अच्छी शुरुआत है। सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए अरबों डॉलर के निवेश के भारी-भरकम निवेश, प्राकृतिक संसाधन और बेहद कुशल मैनपावर की जरूरत है।

भारत इन तीनों मोर्चों पर कमजोर दिख रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत इन तीनों चुनौतियों से निपटते हुए खुद को एक सेमीकंडक्टर ताकत के तौर पर खड़ा कर पाएगा? बीबीसी हिंदी के इस सवाल पर इंडियन इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन के सलाहकार डॉक्टर सत्या गुप्ता कहते हैं, ''देखिये, चुनौतियाँ हैं। हमने पहले भी देश में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की एक-दो कोशिश की हैं। लेकिन वे नाकाम रही हैं। लेकिन इस बार काफी सोच-समझ कर प्लान तैयार किया गया है। राजनीतिक नेतृत्व का पूरा समर्थन है। सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, प्रोडक्ट, स्किलिंग और टैलेंट यानी सभी पहलुओं को ध्यान में रख कर प्लान बनाया गया है।'' 

    डॉ. गुप्ता आगे कहते हैं, '' भारत के सेमीकंडक्टर प्लान को लेकर दुनिया भर के निवेशकों में उत्सुकता और दिलचस्पी है। भारतीय निवेशकों में भी उत्साह है। अहम बात ये है कि भारत पीएलआई स्कीम के तहत सेमीकंडक्टर सेक्टर के लिए जो इन्सेंटिव दे रहा है और वो दूसरे देशों की तुलना में काफी अच्छा है। मैं तो कहूंगा कि भारत का इन्सेंटिव दुनिया में इस समय दिए जा रहे सबसे अच्छे ऑफ़रों में से एक है।''

 

स्रोत : bbc.com/hindi/india

*www.justetf.com

 

 


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