अफवाहें : भूपेंद्र रावत

 अफवाहें भी ख़बर बन जाती है

ज़िन्दगी जीने का सबक बन जाती है

सच अक्सर छुप जाता है,अखबारों में

झूठ, फ़रेब बिकता है सरेआम बाज़ारो में

चारों और झूठ की मंडी सज़ती है

अंधी कानून व्यवस्था चोरो की बस्ती है

बस्ती में बैठे कानून के रखवाले है

चंद टुकड़ों में जो बिकने वाले है

वहशी, गुंडे सारे सत्ता लोभी हो जाते है

स्वार्थ के ख़ातिर संविधान को भूल जाते है

संविधान इनके हाथों की कठपुतली बन जाता है

लाचार जनता का दुःख कौन समझ पाता है

जनता बेचारी भूखी मर जाती है

दाने दाने के लिए तरसती नज़र आती है 

अनाज़ रोपा जाता था कल तक जिस मिट्टी में

हाड़ मांस के पुतले आज मिल जाते है उस मिट्टी में

                                                     - भूपेंद्र रावत


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