वसंत फिर आया है : अभिनव

 

(वसंत फिर आया है)

 

पर्वतों की हिम शिखर श्वेत श्रृंखला से संदेश आया है

पतझड़ बीते पुष्प खिले प्रकृति का यौवन आया है

नवीन उमंग संचार धैर्य का पारितोषित आया है

आर्य धरा का संस्कार प्रकृतांचल का आशीष आया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

हृदय हर्ष की पराकाष्ठा कृष्णोत्सव आया है

मनोहर पुष्प सार भालाभिषेक सुगन्धित क्षण आया है

सुमन पिपासा अचला का मनोभाव आया है

नाना प्रकार वनस्पति का सौंदर्य श्रृंगार आया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

समायातीत का गौरव वीरत्वाभिमान आया है

सूर्य की रूधिर लालिमा का प्रणाम उन्हें आया है

अखंड आर्यभूमि संस्कारच्युत नहीं हो पाया है

वसुधैव कुटुंबकम वाहकों ने प्रतिकार जताया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

हिन्द से हिन्दुकुश विजय तोष का बिगुल बजाया है

मस्जिद में आरती, मंदिरों ने अजान सुनाया है

आर्य पुत्र हैं हम, प्रत्येक हिन्दी का लहू पुकार आया है

वीरों का रक्त से भाल तिलक हो आया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

पुष्प आच्छादित पथ, शूर चरण स्पर्श करे, रण बांकुरों का बुलावा आया है

खलिहानों की पगडंडियों में अवरोध आया है

जल रिक्तावस्था में रक्त से भूमि जो सींच आया है

पक्षियों ने भी चहचहाना बंद किया उनका कोलाहल आया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

कुरुक्षेत्र की रक्तरंजित भूमि पर बंधुओं के शवों को जिसने भरा पाया है

माओ, च्येन काई,  जिन्ना, अयूब के प्रहारों से जो न घबराया है

क्षितिज की निलिमा में सूर्य केसरी हो आया है

हरित, श्वेत, नील वर्ण प्रिय मनुजों में भगवा, केसरी, लाल का गुलाल आया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

परम शत्रु से बोधित अशुद्ध जिसे नियति ने बनाया है

अपने अहं में वह बाल, अग्रज से द्वेष रखता आया है

विजित होकर भी उस ज्येष्ठ को संताप आया है

उन आर्य पुत्रों का वसंत फिर आया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

शताब्दियों के मनुज संघर्ष ने इतिहास बोध कराया है

महासमर की परिणति का स्वप्न दिखाया है

क्षुधित को अन्न नहीं, पिपासु को जल नहीं

खण्डहरों से अटा संसार पाया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

विजयिनी आर्यभाल पर शोणित तिलक शोभित हो आया है

प्रफुल्लित जन चेतन, सूर्य लोहित किरणों ने हर्ष जताया है

धर्म, धरा, धन-धान की रक्षा कर मातृ ऋण चुकाया है

प्रतिपक्ष के हर्षोल्लास पर पराक्रमी शिरोमणियों पर प्रकृति ने मुग्ध हो पुष्प बरसाया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

अतीत का विश्व गुरु, इतिहास के पृष्ठों पर गौरवांकित हो आया है

चाणक्य, आर्यभट्ट, पतंजलि, गुप्तकाल का स्वर्ण युग जो देख आया है

लेकर अपार कष्ट माँ भारती ने जिसे पालित-पोषित आशित बनाया है

उस भागीरथी भूमि का वसंत फिर आया है

वसंत फिर आया है, वसंत फिर आया है।

 

 

 

 

अभिनव (शोधार्थी, पीएच.डी.हिन्दी)

संपर्क सूत्र :  abhinav15081988@gmail.com

दूरभाष:8278870988

हिन्दी एवं भारतीय भाषा विभाग

मानविकी एवं भाषा संकाय

हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय

धर्मशाला-176215

 

Comments

  1. वाह, बहुत उम्दा

    ReplyDelete
  2. धन्यवाद, आभार भारत मंथन।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

'वैवाहिक बलात्कार'(Marital Rape) - सच या सिर्फ सोच? : दीपाली

वीरांगना नांगेली

वीर योद्धा राणा सांगा की शौर्य गाथा (A Story of Great Worrier Rana sanga)

भारतीय साहित्य में विभाजन का दर्द

संयुक्त राष्ट्र की भाषाओं में हिंदी शामिल

महिला सशक्तिकरण या समाज का सच : दीपाली

Blood & Faith - Matthew Carr

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर शायरी

विश्व आदिवासी दिवस, 2022

सत्य वचन (उत्तराखंड की लोक कथा) : भूपेंद्र रावत