सामाजिक यथार्थ की परंपरा और यशपाल के उपन्यास


    जिस उपन्यास धारा को प्रेमचंद ने प्रवर्तित किया था, वही आगे चलकर नई-नई सामाजिक समस्याओं का वर्णन तथा विश्लेषण करती रही। इसी धारा को सामाजिक यथार्थवादी धाराकहा जाता है। इस धारा के लेखक किसी भी विचारधारा के मोह से बचते हुए अपने स्वतंत्र नजरिये से समाज की समस्याओं का सूक्ष्म अंकन करते हैं। 1947 ई. से आज तक का समाज जिस प्रकार तेजी से बदलता रहा है, वैसे ही इस धारा की प्रवृत्तियाँ भी बदली है। 1947 ई. के तुरंत बाद राष्ट्रीय चेतना व आजादी का मोह इतना अधिक था कि लेखक देश का सुंदर भविष्य बनाने के लिए बेचैन थे। यह प्रवृत्ति सबसे स्पष्ट रूप में भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास भूले बिसरे चित्रमें दिखती है। उन्हीं का उपन्यास 'टेढ़े-मेढे़ रास्ते' भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। 1955 ई. के बाद आजादी से मोहभंग की स्थिति पैदा हुई जो पूरे छठे दशक में मुखर रही। इस काल का प्रतिनिधि उपन्यास नरेश मेहता द्वारा रचित यह पथ बन्धु थाहै जिसमें आजादी के संघर्ष के निरर्थक चले जाने की पीङा दिखती है। 1970 ई. के आसपास मोह-भंग की पीङा भी समाप्त होने लगी और उदासीनता, निष्क्रियता, पैदा हुई। इस समय के लेखक क्रांति, विद्रोह और विचारधाराओं में आस्था खो चुके हैं। किन्तु उनके भीतर पीङा इतनी ज्यादा है कि बिखरते हुए समाज पर तीखा व्यंग्य किए बिना उन्हें संतोष नहीं मिलता है। इस प्रवृत्ति का सबसे प्रमुख उदाहरण है- श्रीलाल शुक्ल द्वारा रचित राग-दरबारी1970 के दशक के बाद सांप्रदायिकता भारतीय समाज में एक बङी समस्या बनकर उभरी। इस प्रवृत्ति को सबसे बेहतर अभिव्यक्ति भीष्म साहनी ने तमसमें दी।
    60 के दशक में ही तीव्र नगरीकरण और मध्यवर्ग के उभार ने शहरों में ऐसे वर्ग को जन्म दिया जो सामाजिक जीवन से वंचित होकर अकेलेपन की पीङा झेल रहा था जहाँ प्रेम का स्थान उपयोगितवादी संबंधों ने ले लिया था और व्यर्थताबोध गहरा हो गया था। इस प्रवृत्ति पर मुख्यतः राजेन्द्र यादव जैसे लेखकों ने लिखा। उनका उपन्यास की धारा आज भी कई अन्य धाराओं में पर्यवसित होकर सक्रिय बनी हुई है जैसे महिला लेखन की धारा, महानगरीय उपन्यासों की धारा आदि। इस वर्ग के उपन्यासों की सबसे बङी विशेषता यह है कि ये न तो प्रगतिवादियों की तरह समाज को अधिक महत्त्व देती है और न ही मनोवैज्ञानिक उपन्यासकारों की तरह व्यक्ति को। ये व्यक्ति व समाज को जोङकर देखते हैं। ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण मुख्य रूप से अमृतलाल नागर के उपन्यास बूंद व समुद्रमें दिखता है जिसमें बूंदव्यक्ति को व 'समुद्रसमाज को दर्शाता है।[1]
    प्रेमचन्दोत्तर हिन्दी साहित्य क्षेत्र में जनवादी कला लेखक के रूप में यशपाल महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने प्रेमचन्द की कथा-परम्परा को अपने ढ़ंग से विकसित करने का प्रयास भी किया। वे अपने समय के एक प्रखर जनवादी और प्रखर यथार्थवादी कथाकार माने जाते हैं। यशपाल ने कहानियों के अतिरिक्त उपन्यास, निबन्ध, यात्रा - विवरण, आदि विभिन्न साहित्य-विधाओं के साहित्य का सृजन किया है। हिन्दी साहित्य के मूर्घन्य उपन्यासकारों में उनका उल्लेखनीय स्थान है। उनकी साहित्य-संबन्धी चेतना ही उनकी औपन्यासिक चेतना है। उनके अधिकांश उपन्यास साहित्य सम्बन्धी धारणाओं की कसौटी पर खरा उतरते हैं। यशपाल के उपन्यासों ने मार्क्सवाद को लोकप्रिय बनाया है। अपना पहला उपन्यास दादा कॉमरेड (1941) से लेकर अन्तिम उपन्यास "मेरी-तेरी - उसकीबात" (1974) तक यशपाल एक ही समतल भूमि पर न चले, न विषयवस्तु की दृष्टि से, न कलात्मक चित्रण की दृष्टि से। 'दादा कॉमरेड' का यशपाल अराजकतावादी और रोमानी है। तो 'दिव्या' में वे अराजकता से मार्क्सवाद तक की यात्रा करते हैं। झूठा-सच में वे रोमांस से यथार्थवाद तक की यात्रा करते हैं।[2] यशपाल का अपना अनुभव निम्न धर्म वर्ग का है। उपन्यासों में व्यक्त होने वाला दृष्टिकोण यशपाल का अपना है, जो उनके निजी जीवन और अनुभवों से निर्मित हुआ है। वे व्यक्तिगत जीवन को कथानक का आधार बना देने से उनके उपन्यासों की विषयवस्तु में एक प्रकार की जीवन्तता मिलती है। उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण भी यही है।
    यशपाल हिंदी के प्रमुख कहानीकारों में से एक हैं। इनका जन्म 3 दिसंबर सन 1903 को पंजाब के फिरोजपुर छावनी में हुआ था। सन 1921 में फिरोजपुर जिले से मैट्रिक परीक्षा में प्रथम आकर उन्होंने अपनी कुशाग्र प्रतिभा का परिचय दिया। सन् 1921 में ही इन्होंने ‘स्वदेशी आंदोलन’ में सहपाठी लाजपत राय के साथ जमकर भाग लिया। इन्हें सरकार की ओर से प्रथम आने पर छात्रवृत्ति भी मिलीपरंतु न केवल इन्होंने इस छात्रवृत्ति को ठुकरा दिया बल्कि सरकारी कालेज में नाम लिखवाना भी मंजूर नहीं किया। शीघ्र ही यशपाल कांग्रेस से उदासीन हो गए। इन्होंने पंजाब के राष्ट्रीय नेता लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहां से प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगत सिंहसुखदेव तथा राजगुरु के संपर्क में आए। कालेज के विद्यार्थी जीवन में ही ये क्रांतिकारी बन गए। भगत सिंह द्वारा सार्जेंट सांडर्स को गोली मारनादिल्ली असेंबली पर बम फेंकना तथा लाहौर में बम फैक्ट्री पकड़े जाना आदि इन सभी षडयंत्रों में इनका भी हाथ था। बाद में साम्राज्यवादी प्रजातंत्र सेना के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद के इलाहाबाद में अंग्रेजों की गोली का शिकार हो जाने पर यह इस सेना के कमांडर नियुक्त हुए।[3] 23 फरवरी 1932 को अंग्रेजों से लड़ते हुए यह गिरफ्तार हो गए। इन्हें 14 वर्ष की जेल की सजा हो गई। जेल में ही इन्होंने विश्व की अनेक भाषाओं जैसे फ्रेंचइटालियनबांग्ला आदि का अध्ययन किया। जेल में ही इन्होंने अपनी प्रारंभिक कहानियां लिखी। सन 1936 में जेल में ही इनका विवाह प्रकाशवती कपूर से हुआ। इनकी तरह वे भी  क्रांतिकारी दल की सदस्या थी। उनका झुकाव मार्क्सवादी चिंतन की ओर अधिक हुआ। उनकी कहानी ‘मक्रिल’ के द्वारा उन्हें बहुत यश मिला। उनकी यह कहानी ‘भ्रमर’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उन्होंने हिंदी साहित्य की सेवा साहित्यकार तथा प्रकाशक दोनों रूपों में की। 26 दिसंबर 1976 को इनकी मृत्यु हो गई।
    यशपाल साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि सामाजिक यथार्थ है। मध्यवर्गीय समाज की समस्याओं की अभिव्यक्ति के लिये उन्होंने सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक कथावस्तु का चयन किया। यही कारण है कि उनके उपन्यासों में जहाँ एक ओर सामाजिक समस्याओं का विश्लेषण है तो दूसरी ओर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचित उपन्यासों इतिहासकार की सूझबूझ और गहनता भी है। यशपाल के बारह उपन्यास प्रकाशित हुए है  : दादा कॉमरेड (1941),  देश द्रोही  (1943 3), दिव्या (1945),  पार्टी कॉमरेड (1947),  मनुष्य के रूप (1949),  अमिता (1956),   झूठा-सच भाग-1 (1958),  झूठा-सच भाग-2  (1960),  बारह घंटे (1963), अप्सरा का शाप (1965),  क्यों फँसे?  (1968),  मेरी-तेरी - उसकी बात  (1974) ।
    दादा कॉमरेड :  दादा कॉमरेड यशपाल का प्रथम उपन्यास है। इसमें यशपाल की बदलती राजनैतिक चेतना और प्रेम तथा यौन विषयक परिकल्पनायें परिलक्षित हुई है। उपन्यास का एक छोर यदि राजनीति से संबद्ध है तो दूसरा छोर प्रेम, काम, विवाह और नारी की सामाजिक स्थिति से। यह उपन्यास बारह छोटे-छोटे अध्यायों में विभक्त है। जिस रोचक ढंग से उपन्यास का ताना-बाना बुना गया है, वह यशपाल की रचनात्मक प्रतिभा का प्रमाण है। इस में गाँधीवाद, क्रान्तिकारियों का प्रभाव, कांग्रेसी संघर्ष, साम्यवाद का प्रभाव, सर्वत्र व्याप्त है। पूरे उपन्यास के मेरुदंड में अंग्रेजी सत्ता का शोषण, अफ्सरशाही तथा उनके सिपाहियों के आतंक की व्याप्ति दिखाई पडती है। राजनैतिक एवं सामाजिक शक्तियों की पहचान की दृष्टि से दादा कॉमरेड की अपनी एक विशिष्ट भूमिका रही है।
    देश द्रोही :  देश द्रोही यशपाल का दूसरा उपन्यास है। इसमें सन् 1930 ई. से सन् 1942 ई. तक की राज नैतिक हलचलों को समेटा है। इस में साम्यवादी दल के प्रति जनता में व्याप्त भ्रान्तियों का निराकरण किया गया है ।  दादा कॉमरेड में प्रेम की नयी नैतिकता है तो देशद्रोही में रोमांस का रंग अधिक है । यशपाल ने इस उपन्यास में विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं और उनकी नीतियों को उद्घाटित किया है। रोमानी प्रसंगों की अधिकता के कारण इस में राजनैतिक पक्ष कम है। गोदान के बाद देश के राजनैतिक और सामाजिक जीवन का इतना सफल चित्रण किसी अन्य उपन्यास में नहीं मिलता। इस उपन्यास से व्यक्ति को जागरूक रहने, संघर्षों से जुडे रहने और अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जाने की प्रेरणा प्राप्त होती है।
    दिव्या : दिव्या में लेखक ने ऐतिहासिक वातावरण के आधार पर यथार्थ का रंग देने का प्रयास किया है। यह उपन्यास इतिहास की नयी संभावनाओं का संकेत देता है। यह उपन्यास युग-युग से प्रताडित, त्रस्त, शोषित दलित नारी का प्रतिनिधित्व करता है। इसे 'बौद्धकालीन उपन्यास' की संज्ञा भी दे सकते हैं। नारी उस युग में भी शोषण की शिकार थी, विलासिता की वस्तु थी, आज भी उसकी स्थिति भिन्न नहीं। आज भी वह पूर्णतः स्वतंत्र नहीं। अतः दिव्या ऐतिहासिक और समकालीन दोनों ही है।
पार्टी कॉमरेड :  इस उपन्यास की रचना सन् 1946 ई. में हुई । यह लघु उपन्यास है । इस में राजनैतिक वातावरण का चित्रण है । सामाजिक समस्याओं का वर्णन उपन्यास में कम ही हुआ है। फिर भी यहाँ भी पुरुष सत्तात्मक समाज में नारी की निरीह स्थिति का चित्रण हुआ है। यह उपन्यास आकार में छोटा होते हुए भी पूर्ण रूपेण सक्षम है। स्वतंत्रता के लिये संघर्ष रत काँग्रेस, कम्यूणिस्ट के द्वन्द्व, अंग्रेजों के दमनचक्र, सैनिक-विद्रोह, पूंजीपतियों की स्वार्थपरक विचार धारा तथा प्रचार के साधनों के दुरूपयोग का सशक्त दस्तावेज है यह उपन्यास।
    मनुष्य के रूप :  सन् 1949 ई. में यह उपन्यास लिखा गया है। इस में वर्तमान स्त्री-प्रेम विवाह, समर्पण भावना आदि समस्याओं को गंभीर पूर्वक प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। देशद्रोही और दादा कॉमरेड की तरह इस में भी लेखक ने प्रेम-प्रसंगों को अधिक उभारा है।
    अमिता : यह उपन्यास सन् 1956 ई. में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास विश्वशाँति आन्दोलन की प्रेरणा से लिखा गया है। यशपाल ने छः वर्षीय बालिका के माध्यम से यह प्रतिपादित किया है कि जब तक व्यक्ति अहंकारी और अपनी महत्वाकाक्षाओं की परितृप्ति करता रहेगा तब तक सत्य, अहिंसा, प्रेम, शान्ति आदि मूल्य प्रतिष्ठित नहीं हो सकते।
    झूठा-सच : 'झूठा-सच' में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के पूर्व हुए साम्प्रदायिक दंगों का व्यापक और यथार्थ चित्रण किया गया है। यह चित्रण इतना वास्तविक और हृदय विदारक है कि यह उपन्यास न केवल हिन्दी साहित्य, बल्कि संपूर्ण विश्वसाहित्य में अपनी अमिट छाप छोडता है। झूठा-सच् भाग - 2 : 'झूठा-सच्' के द्वितीय भाग में स्वतंत्रता के पश्चात् की स्थिति का सही चित्रण किया गया है। सत्तासीन नेताओँ की स्वार्थ सिद्धि को व्यंग्यात्मक शैली में व्यक्त किया गया है। साम्प्रदायिकता की आग को भडकाने में अंग्रेजों की साम्राज्यवादी चालों के उल्लेख के साथ-साथ नेताओं की अधिकार लिप्सा और स्वार्थ परता का रेखांकन भी उपन्यास में दृष्टि गोचर होता है।
     बारह घंटे : 'बारह घटे' में प्रेम और विवाह की नैतिकता संबन्धी पुराने मूल्यों की चुनौती दी गयी है। प्रेम और विवाह की नैतिकता को केन्द्र बनाकर यशपाल ने इसके स्वरूप पर गंभीरता से विचार किया है। लेखक ने प्रेम और विवाह विषयक नैतिक मूल्यों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया है।
    अप्सरा का शाप : इसमें दुष्यन्त-शकुन्तला विषयक पौराणिक आख्यान को नवीन आयाम देने का प्रयत्न है। इस कृति के माध्यम से पुरुष सत्तात्मक समाज में नारी शोषण की समस्याँ को एक बार फिर उठाया है। लेखक ने उपर्युक्त तीनों (दिव्या, अमिता, अप्सरा का शाप) उपन्यास ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि में नारी जीवन की स्थितियों को मूर्तिमान किया है।
    क्यों फँसे? : 'क्यों फँसे' में उन्मुक्त यौनाचार और नर-नारे संबन्धों का विश्लेषण है। प्रेम और यौन संबन्धों में किसी प्रकार की नैतिकता, एकाधिकार और स्वामित्व को वे निरर्थक समझते हैं। नर-नारी संबन्धों में यशापाल संतति निरोध के उपायों को महत्वपूर्ण मानते हैं।
    मेरी-तेरी - उसकी बात : यह सन् 1947 में लिखा गया उपन्यास है। लेकिन कथानक पराधीन भारत के तीव्र राष्ट्रीय आन्दोलन की पृष्ठभूमि से निर्मित है। इस में यशपाल ने राष्ट्रीय आन्दोलनों को प्रमुख विषय बनाया है। उनका विश्वास था कि क्रान्तिकारी ही भारत को स्वतंत्रता दिला सकते हैं। राजनैतिक प्रसंगों के साथ लेखक ने राजनैतिक कार्यकर्ताओँ के व्यक्तिगत जीवन पर भी प्रकाश डाला है।
    संकट मोचक :  'संकट मोचक' में परिवार नियोजन के कार्यक्रम, संततिनिरोध के उपायों को व्यक्त किया गया है। इस में सामान्य और सत ही कोटि की कथा विन्यस्त की गयी है। यह उपन्यास बेहद कमजोर उपन्यास है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि यशपाल का समाज के प्रति अपना अलग दृष्टिकोण है। उन्होंने समाज की अपेक्षा व्यक्ति को अधिक महत्व दिया है। वह एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था चाहते हैं जिसमें किसी व्यक्ति या वर्ग का शोषण न होता हो। वह सभी सामाजिक रूढ़ियों और सामाजिक संस्थाओं को समाप्त करना चाहते हैं क्यों ये संस्थाएँ और रूढ़ियाँ मनुष्य को सहज रूप से नहीं जीने देतीं। सामाजिक शोषण को समाप्त करने के लिए यशपाल विवाह संस्था को समाप्त कर देना चाहते हैं। यशपाल ने अपने उपन्यासों में शोषितों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण, सहानुभूति, व्यक्ति स्वातंत्र्य एवं उदारता आदि मूल्यों को चित्रित किया है। ये सभी मूल्य समाज के कल्याण और उसके विकास की भावना से संबंधित हैं। परंपरागत रूढ़ियों एवं शोषण का विरोध करते हुए क्रांति का आवाहन और स्वस्थ मूल्यों का विकास करना ही उनका उद्देश्य रहा है। अमिता उपन्यास की बालिका अमिता द्वारा किसी से न छीनना, किसी को नहीं डराना एवं किसी को नहीं मारनाअपनाया गया मंत्र समाज सेवा एवं कल्याण की भावना सं संबद्ध है। इस उपन्यास में यशपाल ने युद्ध का विरोध किया है। अमिता बड़ी निर्भीकता से अहिंसा की प्रकृति का समर्थन करती है जिसके फलस्वरूप अशोक प्रतिज्ञा करता है- वह किसी से नहीं छीनेगा, किसी को डराएगा नहीं, किसी को मारेगा नहीं। अमिता द्वारा इस प्रकार युद्ध का विरोध करना, अहिंसा तथा विश्व प्रेम का संदेश देना मानवीय मूल्यों को प्रकट करता है। उनके उपन्यासों की नींव सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं पर खड़ी है। वास्तव में समाज और साहित्य का पारस्परिक संबंध होता है। यह बात और है कि कभी-कभी लेखक अपने साहित्य में ऐसे समाज का वर्णन करता है जैसा वह चाहता है या फिर उस समाज के रीति-रिवाज, मूल्य और मान्यताओं का वर्णन करता है, जिसमें वह रहता है।

[1] https://www.hindisahity.com
[2]यशापल पुनर्मूल्यांक, सम्पादक कुँवरपालसिंह, पृ.सं.198
[3] https://www.hindigurujee.com

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