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Showing posts from May, 2022

मलबे का मालिक: मोहन राकेश

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   मोहन राकेश  पूरे साढ़े सात साल के बाद लाहौर से अमृतसर आए थे। हॉकी का मैच देखने का तो बहाना ही था ,  उन्हें ज़्यादा चाव उन घरों और बाज़ारों को फिर से देखने का था ,  जो साढ़े सात साल पहले उनके लिए पराए हो गए थे। हर सड़क पर मुसलमानों की कोई न कोई टोली घूमती नज़र आ जाती थी। उनकी आंखें इस आग्रह के साथ वहां की हर चीज़ को देख रही थीं ,  जैसे वह शहर साधारण शहर न होकर एक ख़ास आकर्षण का केन्द्र हो। तंग बाज़ारों में से गुज़रते हुए वे एक-दूसरे को पुरानी चीज़ों की याद दिला रहे थे-देख , फतहदीना , मिसरी बाज़ार में अब मिसरी की दुकानें पहले से कितनी कम रह गई हैं। उस नुक्कड़ पर सुक्खी भठियारन की भट्ठी थी , जहां अब वह पान वाला बैठा है। यह नमक मण्डी देख लो , ख़ान साहब! यहां की एक-एक ललाइन वह नमकीन होती है कि बस! बहुत दिनों के बाद बाज़ारों में तुर्रेदार पगड़ियां और लाल तुर्की टोपियां दिखाई दे रही थीं। लाहौर से आए हुए मुसलमानों में काफ़ी संख्या ऐसे लोगों की थी , जिन्हें विभाजन के समय मजबूर होकर अमृतसर छोड़कर जाना पड़ा था। साढ़े सात साल में आए अनिवार्य परिवर्तनों को देखकर कहीं उनकी आंखों में हैरानी भर

ख़ामोशी : भूपेंद्र रावत

  मेरी खामोशी बताती है मेरा हाल अब हर्फ़ों का वज़ूद ही कहाँ रहा एक ओर हो रही है बग़ावत मेरे अंदर मैं गुमसुम बैठा सब सहता ही रहा                                       - भूपेंद्र रावत           

विश्व धूम्रपान निषेध दिवस (World No Tobacco Day)

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य राज्यों ने 1987 में तंबाकू महामारी और इससे होने वाली रोकथाम योग्य मृत्यु और बीमारी पर वैश्विक ध्यान आकर्षित करने के लिए विश्व तंबाकू निषेध दिवस बनाया।  1987 में, विश्व स्वास्थ्य सभा ने संकल्प WHA40.38 पारित किया, जिसमें 7 अप्रैल 1988 को "एक विश्व धूम्रपान निषेध दिवस" ​​होने का आह्वान किया गया।  1988 में, प्रस्ताव WHA42.19 पारित किया गया था, जिसमें हर साल 31 मई को विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाने का आह्वान किया गया था। तंबाकू से प्रत्येक साल 8 मिलियन से अधिक लोगों को अपनी जान गवानी पड़ती है और यह हमारे पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँचाता है। खेती, उत्पादन, वितरण, खपत और उपभोक्ता कचरे के बाद मानव स्वास्थ्य को और नुकसान पहुंचाता  है और हमारे पर्यावरण को नष्ट करता है, खेती, उत्पादन, वितरण, खपत और उपभोक्ता कचरे के बाद मानव स्वास्थ्य को और नुकसान पहुंचाता है। पर्यावरण पर तंबाकू उद्योग का हानिकारक प्रभाव बहुत बड़ा है और हमारे ग्रह के पहले से ही दुर्लभ संसाधनों और नाजुक पारिस्थितिक तंत्र पर अनावश्यक दबाव बढ़ा रहा है। तंबाकू के धुएं में 7000 से अधिक रसायन शामि

हिंदी पत्रकारिता दिवस

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  चित्र : हिंदी पत्रकारिता दिवस* हिदी पत्रकारिता दिवस हर साल 30 मई को मनाया जाता है। दरअसल इसे मनाने का मुख्य कारण यह है कि इसी दिन साल  1826  में हिंदी भाषा का पहला अखबार  ' उदन्त मार्तण्ड '  प्रकाशित होना शुरू हुआ था।   इसका प्रकाशन तत्कालीन कलकत्ता शहर से किया जाता था और  ' पंडित जुगल किशोर शुक्ल'   ने इसे शुरू किया था। पं. शुक्ल स्वयं ही इसके प्रकाशक और संपादक थे। मूल रूप से कानपुर के रहने वाले जुगल किशोर शुक्ल वकील भी थे। उन्होंने कलकत्ता को अपनी कर्मभूमि बनाया और वकील के साथ साथ पत्रकार तथा संपादक व प्रकाशक भी बन गए। उन्होंने कलकत्ता के बड़ा बाजार इलाके में अमर तल्ला लेन , कोलूटोला से ' उदन्त मार्तण्ड ' अखबार का प्रकाशन शुरू किया था। यह साप्ताहिक अखबार हर हफ्ते  ' मंगलवार'   को पाठकों तक पहुंचता था। पंडित शुक्ल ने कलकत्ता को अपनी कर्मभूमि इसलिए भी बनाया था क्योंकि उस समय देश की राजधानी यही शहर था। उस समय की भाषा में अंग्रेजी के बाद बांग्ला और उर्दू का काफी प्रभाव था। यही कारण है कि उस कालखंड में अधिकांश अखबार अंग्रेजी , बांग्ला और फारसी में छापे

ड्रोन क्षेत्र में भारत के बढ़ते कदम

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चित्र : ड्रोन का छायाचित्र* आम आदमी की जिंदगी मड्रोन के उपयोग को बढ़ाने के लिए भारत सरकार पिछले कुछ सालों से अपने ड्रोन पॉलिसी में नरमी ला रही है। अब ड्रोन टेक्नोलॉजी का संबंध सिर्फ डिफेंस सेक्टर से ही नहीं है बल्कि आम आदमी के जन-जीवन में इसका दखल बढ़ता जा रहा है। एग्रीकल्चर, हेल्थकेयर, टूरिज्म और दूसरे क्षेत्र में ड्रोन के लिए व्यापक संभावनाएं हैं। जिसको देखते हुए ड्रोन बनाने वाली कंपनियों में भारी एक्शन देखने को मिल रहा है। ड्रोन टेक्नोलॉजी अब सिर्फ डिफेंस तक सीमित नहीं रह गई है। इस बात की बड़ी संभावना है कि भारत सरकार ई-कॉर्मस कंपनियों के सप्लाई चेन सिस्टम में ड्रोन के उपयोग को मंजूरी दे सकती है । जल्द ही हमें अमेजॉन और फिल्पकॉर्ट जैसी कंपनियां ड्रोन के जरिए अपने ग्राहकों तक सप्लाई करती नजर आ सकती हैं। भारतीय ड्रोन मार्केट में हाल में बढ़े एक्शन को देखते हुए।  Adani Enterprises जैसी कंपनी भी अब ड्रोन जैसे बिजनेस में कदम रखने जा रही है। स्रोत : मनी कंट्रोल * चित्र सोशल मीडिया से प्राप्त 

भारतीय साहित्य में विभाजन का दर्द

  15 अगस्त 1947, के दिन जब देश  200 साल की अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हुआ , तो जहां एक ओर देश के आज़ाद होने की खुशी थी , तो वहीं दूसरी तरफ विभाजन का दर्द भी भारत के नसीब में लिखा जा चुका था।   स्वतंत्रता मिलने के साथ ही देश के दो टुकड़े हो गए।   भारत का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा कटकर एक नया देश   पाकिस्तान   बना।   राजधानी दिल्ली एक तरफ आज़ादी का जश्न मनाने के लिए तैयार हो रही थी।   लाल किले पर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रीय ध्वज फहराकर देश के स्वाधीन होने की घोषणा की।   एक तरफ देश आज़ादी का जश्न मना रहा था , तो वहीं दूसरी ओर देश का एक हिस्सा धू-धू कर जलने लगा।   हिन्दुस्तान बंटवारे की त्रासदी से गुजर रहा था।   खुशी का मौका पलभर में खून और दहशत में बदल गया था।   कम से कम डेढ़ करोड़ लोग अपना घर-बार छोडने पर मजबूर हो गए।   इस दौरान हुई लूटपाट , बलात्कार और हिंसा में कम से कम पंद्रह लाख लोगों के मरने और अन्य लाखों लोगों के घायल होने का अनुमान है. बंटवारे में न सिर्फ देश को बांटा गया बल्कि लोगों के दिल भी बांटने की  कोशिश की गयी।  विभाजन  के इसी दर्द को भारतीय साहित्यकार

प्रकृति की गोद में : भूपेंद्र रावत

  रहने दो मुझे प्रकृति की गोद में, खुले आसमान के नीचे, आधुनिक होते शहर के शोर से दूर। जहाँ से हुई थी, मानव युग की शुरुआत, मनुष्यों ने सीखा था, जीवन जीना वृक्षो, नदियों और पक्षियों से परन्तु विकास के स्वर ने प्रकृति खड़ा कर दिया विनाश के कटघरे में।                                                     -   भूपेंद्र रावत 

महिला सशक्तिकरण या समाज का सच : दीपाली

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  चित्र  :  एस. पेचियामल्ल आज मैं आप सभी के समक्ष दो अलग-अलग स्त्रियों के जीवन संघर्ष को प्रस्तुत करना चाहती हूँ जिन्होंने सामाजिक बेड़ियों, वर्जनाओं और मानसिक तथा शारीरिक प्रताडनाओं के बावजूद दृढ़तापूर्वक विपरीत परिस्थितियों के सक्षम हार नहीं मानी। इन जिंदगियों पर मेरे द्वारा किया गया यह मंथन है जो आज के आधुनिक दौर में भी समाज की न बदलती हुई तस्वीर को हमारे समक्ष उकेर कर रख देता है जिसमें स्त्रियों को अन्य पर निर्भर होने के कारण ही नहीं बल्कि स्वावलंबी बनने के क्रम में भी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना व शोषण का शिकार होना पड़ता है। इसमें एक कथा है तमिलनाडु राज्य के थूथुकड़ी जिले के कट्टुनायकमपट्टी नामक गाँव में 36 वर्षों से पुरुष बनकर जीवन जीने के लिए मजबूर होने वाली एस. पेचियामल्ल की। जिसे 20 वर्ष की उम्र में विवाह के उपरान्त मात्र 15 दिन के भीतर ही वैधव्य का भार झेलना पड़ा। पति के देहांत के लगभग नौ माह पश्चात् जनम हुआ उसकी बेटी का जिसके पालन-पोषण का प्रश्न एस. पेचियामल्ल के सामने आ खड़ा हुआ। इसके लिए महिला ने किसी से भी आर्थिक सहायता लेने की बजाय स्वयं की मेहनत से जीवन यापन का प्रयास किया