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Showing posts from 2022

अनमोल राय : असम की लोक कथा

  जयंत फुकन नामक एक व्यक्ति सिलचर के पास एक गाँव में निवास करता था ।  वह एक संपन्न परिवार में जन्मा था ।  जमीन-जायदाद, रुपये-पैसे की उसे कोई कमी न थी और वह सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा था । एक दिन वह पड़ोस के गाँव में रहने वाले अपने चाचा के पोते के विवाह में सम्मिलित होने गया ।  विवाह उपरांत वह कुछ दिन गाँव देखने वहीं रुक गया । एक दिन घूमते-घूमते वह वहाँ के हाट-बाज़ार पहुँचा. तरह-तरह के सामानों से सजी दुकानों को देख वह बहुत प्रसन्न हुआ ।  दिन भर वह हाट में घूमता रहा ।  शाम होने को आई, तो देखा कि दुकानदार दुकान बंद कर घर लौट रहे हैं ।  वह भी लौटने को हुआ ।  लेकिन तभी उसकी दृष्टि एक दुकान पर पड़ी, जो उस समय भी खुली हुई थी । उसने दुकानदार से पूछा, “क्यों भाई, घर नहीं जाना? दुकान बंद नहीं करोगे?” “मेरी कोई बिक्री नहीं हुई भाई, कैसे घर जाऊं?” दुकानदार बोला । “क्या बेचते हो?” जयंत ने पूछा । “मैं सलाह बेचता हूँ । ” उस व्यक्ति ने उत्तर दिया । यह सुनकर जयंत आश्चर्यचकित रह गया और पूछा, “क्या कहा? सलाह? कैसी सलाह?” “मूल्य चुकाओगे, तभी सलाह मिलेगी, बिना मूल्य के कुछ भी नहीं मिलता । ” दुकानदार बोला । जयंत

अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस : 2022

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2 जुलाई को, दुनिया भर की सहकारिताएं सहकारिता का 100वां अंतर्राष्ट्रीय दिवस (#CoopsDay) मनाएंगी। संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष के एक दशक बाद, जिसने दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने के लिए सहकारी समितियों के अद्वितीय योगदान को प्रदर्शित किया, इस वर्ष का #CoopsDay का नारा - "सहकारिता एक बेहतर विश्व का निर्माण" - अंतर्राष्ट्रीय वर्ष की थीम को प्रतिध्वनित करती है। संयुक्त राष्ट्र दुनिया भर में सहकारी समितियों को यह मनाने के लिए आमंत्रित करता है कि कैसे मानव-केंद्रित व्यापार मॉडल, स्वयं सहायता, आत्म-जिम्मेदारी, लोकतंत्र, समानता, समानता और एकजुटता के सहकारी मूल्यों और ईमानदारी, खुलेपन, सामाजिक के नैतिक मूल्यों से प्रेरित है। जिम्मेदारी और दूसरों की देखभाल करना, एक बेहतर दुनिया का निर्माण करना है। दुनिया भर में काम करते हुए, अर्थव्यवस्था के कई अलग-अलग क्षेत्रों में, सहकारी समितियों ने खुद को औसत से अधिक संकटों के प्रति अधिक लचीला साबित किया है। वे आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा देते हैं, पर्यावरणीय गिरावट और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ते हैं, अच्छी नौकरियां पैदा करते हैं, ख

सत्य वचन (उत्तराखंड की लोक कथा) : भूपेंद्र रावत

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एक गाय हमेशा जंगल जाती थी. उसका एक बछड़ा था. गाय जिस दिन हरी-हरी घास से पेट भर खाती उस दिन बछड़ा छककर दूध पीता. बछड़े को अधिक दूध पिलाने की लालसा में गाय जंगल में दूर-दूर तक निकल जाती. हरी घास का लोभ उसे संवरण नहीं हो पाता था. घास चरते-चरते एक दिन गाय काफी दूर निकल गयी. जंगल में एक बाघ था. बाघ की नजर जैसे ही गाय पर पड़ी तो वह खुशी से झूम उठा. वह गुर्राया, डर के मारे गाय की हालत पतली हो गयी. वह बोली, “घर पर मेरा एक बछड़ा है. जब मैं भरपेट घास नहीं चरती तो छककर उसे दूध नहीं पिला पाती. वह मेरा इन्तजार कर रहा होगा, आज मुझे नहीं खाओ. मुझे घर जाने दो. उसे दूध पिलाकर मैं लौट आऊंगी.” गाय की बात पर बाघ खूब हंसा-बोला, “मुझे बेवकूफ समझ रही हो. एक बार जान बचाकर जाओगी तो फिर क्यों आओगी. मुझे तो भूख लगी है- मैं तुझे अपना भोजन बना कर रहूंगा.” गाय ने बड़ी मिन्नतें कीं. आखिकार वह बाघ को विश्वास दिलाने में सफल हो गई. बाघ का मन बछड़े की बात पर पिघल गया- फिर भी उसने गुर्राते हुए कहा, “मैं तेरे लौटने की प्रतीक्षा करूंगा. वरना घर पर आकर तुझे और तेरे बछड़े को भी मार कर खा जाऊंगा.” गाय के कंठ में अटके प्राण वा

World Asteroid Day 2022

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The Asteroid Day’ is celebrated on June 30 every year. It is held on the anniversary of the Siberian Tunguska event that took place on June 30, 1908, the most harmful known asteroid-related event on Earth in recent history. The United Nations has proclaimed it be observed globally on June 30 every year in its resolution. What is an Asteroid? : An asteroid is a minor planet that didn't develop entirely when the Solar System was born. A million asteroids exist in the orbit of the Sun. Most of them are in the central asteroid belt, the area between Mars and Jupiter orbits. They are of diverse size and shape because they are created in different locations and different distances from the Sun. They are formed of different rocks but contain clay or metal, such as nickel and iron. History of International Asteroid Day : In December 2016, the United Nations General Assembly adopted resolution A/RES/71/90 and declared June 30 as International Asteroid Day. The day marks Earth's most mas

National Statistics Day 2022

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लैटिन शब्द "स्टेटस" से व्युत्पन्न 'सांख्यिकी' का अर्थ है "राजनीतिक राज्य" या "सरकार।" सदियों पहले, सांख्यिकी शब्द का इस्तेमाल राजाओं को भूमि, कृषि, जनसंख्या और उनकी सेना के बारे में जानकारी की आवश्यकता के लिए किया जाता था। सांख्यिकी विश्लेषण और निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज, सांख्यिकी केवल अर्थव्यवस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, आतिथ्य, खेल, मौसम, जनसंख्या, आदि सहित जीवन के अन्य सभी क्षेत्रों में उपयोग की जाती है। प्रो. प्रशांत चंद्र महालनोबिस :  प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस, जिन्हें उनके सहयोगियों द्वारा 'पीसीएम' कहा जाता था, एक प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक और व्यावहारिक सांख्यिकीविद् थे। उन्होंने महालनोबिस दूरी, एक सांख्यिकीय माप और यादृच्छिक नमूनाकरण की शुरुआत की। वह भारत के पहले योजना आयोग के सदस्यों में से एक थे और उन्होंने पहली 5 वर्षीय योजना को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  प्रो. महालनोबिस आज जिस तरह से सर्वेक्षण किए जाते हैं, उसे डिजाइन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने पायलट सर्वे

मैं मिलूंगा तुम्हें : भूपेंद्र रावत

 मैं मिलूंगा तुम्हें  ज़िंदगी के उसी मोड़ पर जिस सफ़र के मोड़ पर तुम मुझे  छोड़ कर गयी थी तन्हा। मन करे अगर  तुम्हारा तो लौट आना लेकिन इस बार मैं दूंगा  तुम्हे एक शपथ ज़िंदगी भर  साथ रहने की। क्या निभा पाओगी वादा? मेरे संग ज़िंदगी भर साथ रहने का अगर हाँ तो स्वागत है तुम्हारा फिर से  उस उदासी भरे  कमरों की चौखटों पर उम्मीद करता हूँ,कि तुम नीरस सी  इस ज़िंदगी के केनवास में फिर से भरोगी खुशहाली के रंग।

जब मैं लिखता हूँ : भूपेंद्र रावत

जब मैं लिखता हूँ, वफ़ा लिखता हूँ। तेरे बिन ज़िंदगी की सज़ा लिखता हूँ बग़ावत कर देती है कलम मेरी जब भी बेवफ़ाई की वजह लिखता हूँ।                                        - भूपेंद्र रावत 

Autism : Bhupendr Rawat

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The autism spectrum disorders are a heterogenous neuro of meri behavioural syndrome, characterised by difficulties in the development of social relationships and communication skills, limited or severely impaired imagination and extremely repetitive and rigid patterns of behaviour,and marked by the presence of unusually strong narrow interest. There is no single cause for these disorder. This disorder appear during the first three years of life, and know no racial, ethnic,or social boundaries. Family income, life style and educational level do not effect the chance of autism's occurrence. The word 'Autism' was first used by Bleuler, a swiss psychiatrist in1911 to refer to schizophrenia.  Then, over 50 year ago, Leo kanner(1896-1981), published a paper I. 1943 on "early infantile autism'' to this group of children, all of whom appeared to share common characteristics such as withdrawal and ritualistic behaviours. After Kanner, paediatrician Hans Asperger (1906-1

CBSE 10th & 12th Result

हाल ही में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा 10वीं और 12 वीं कक्षा के टर्म -2 की परीक्षा का समापन सफलता पूर्वक किया गया। जहाँ एक ओर कक्षा 10वीं टर्म -2 बोर्ड परीक्षा 24 मई, 2022 को समाप्त हुई, वहीं दूसरी ओर कक्षा 12वीं की परीक्षाएं 15 जून, 2022 को समाप्त हुए। अब परीक्षा में सम्मिलित हुए छात्रों का इंतेज़ार जल्द ही खत्म होने को है क्योंकि जल्द ही केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड(CBSE) 10वीं और 12वीं कक्षा के परिणाम की घोषणा करने वाला है। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) इस माह के अंत तक या फिर जुलाई के पहले सप्ताह तक 10वीं 12वीं का रिजल्ट जारी कर देगा। रिपोर्ट के अनुसार, सीबीएसई ने कॉपियों का मूल्यांकन पूर कर लिया है तथा छात्रों के अंकों को भी साइट पर अपलोड करने की प्रक्रिया लगभग हो चुकी है। एक बार मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद, बोर्ड टर्म 1 और टर्म 2 के परिणामों को संकलित करेगा और कक्षा 10 और 12 के लिए अंतिम सीबीएसई परिणाम 2022 जारी करेगा। आपको बता दे कि, बोर्ड ने अभी तक टर्म 1 अंक को दिए जाने वाले मार्क्स को साझा नहीं किया है। सीबीएसई की ओर से

जिंदगी : भूपेंद्र रावत

 हर दर्द के लिए दवा नहीं दी जाती हर दफ़ा जीने की वजह नहीं दी जाती जी ली जाती है जिंदगी अपने ही असूलों से दूसरों के सहारे ज़िंदगी की निबाह नहीं दी जाती। ज़िंदगी मे काफिले और भी है तेरे सिवा जीने की और भी वज़ह है तेरे सिवा एक तू ही नही जो दवा दे हर ज़ख्म की दर्द-ए-पैहम अभी और भी है तेरे सिवा जब कोई रिश्ता निभाना मुश्किल हो  अपनो पर हक़ जताना मुश्किल हो निकाल लो बाहर खुद को रिश्तों के उस बोझ से जहाँ रिश्तों का वज़ूद बचाना मुश्किल हो जब जिरह किसी रिश्ते की बुनियाद बन जाती है अपनो के बीच ही खुद का वज़ूद खोती जाती है टूट जाती है नेह की डोर उस वक़्त रिश्ते की डोर जब नाज़ुक हो जाती है ज़िंदगी दर्द में, जीना अक़्सर सीखा ही देती है ज़ख्म हो गहरा, दर्द को पीना सीखा ही देती है नही की जाती यां किसी से मरहम की उम्मीद अक्सर ख़ामोशी लबों को सीना सीखा ही देती है                                                    - भूपेंद्र रावत 

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती / सोहनलाल द्विवेदी

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International Day against Drug Abuse and Illicit Trafficking

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  व्यसन (नशा) शब्द अंग्रेजी के ‘एडिक्ट‘ शब्द का रूपान्तरण है, जिससे शारीरिक निर्भरता की स्थिति प्रकट होती है। व्यसन का अभिप्राय शरीर संचालन के लिए मादक पदार्थ का नियमित प्रयोग करना है अन्यथा शरीर के संचालन में बाधा उत्पन्न होती है। व्यसन न केवल एक विचलित व्यवहार है अपितु एक गम्भीर सामाजिक समस्या भी है। तनावों, विशदों, चिन्ताओं एवं कुण्ठाओं से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति कई बार असामाजिक मार्ग अपनाकर नशों की और बढ़ने लगता है, जो कि उसे मात्र कुछ समय के लिए उसे आराम देते हैं। किसी प्रकार का व्यसन (नशा) न केवल व्यक्ति की कार्यक्षमता को कम करता है अपितु यह समाज और राष्ट्र दोनों के लिए हानिकारक है। स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए तो व्यसन (नशा) विभिन्न प्रकार की बिमारियों को आमंत्रण देता है। नशीले पदार्थ के पयोग से व्यक्ति मानसिक एवं शारीरिक तौर पर पूर्णतया आश्रित हो जाता है, जिसके हानिकारक प्रभाव केवल व्यक्ति ही नहीं अपितु उसके परिवार और समाज पर भी पड़ते हैं। अंतराष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार नशे के बढते हुए हालातों तथा समाज पर इसके दुष्परिणामों और दुप्रभावों को मद्देनजर रखते हुए, संयुक्त राष्

भारत वैभव

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इस पुस्तक में वेद तथा ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषद् सहित वेदाङ्ग एवं उपवेद में वर्णित आर्ष ज्ञान परंपरा, पुराणों की महत्ता, दर्शन व उसके विविध स्वरूप, भारत राष्ट्र की सनातनता के वास्तविक स्वरूप, भारतीय संस्कृति सभ्यता संस्कार व लोक व्यवस्थाएँ, भाषाओं व लिपियों का विकास, अंक व गणित विद्या, कालगणना की भारतीय अवधारणाएँ, प्राचीन शिक्षा पद्धति की उत्कृष्टता, कला (नृत्य, संगीत, वाद्य व (स्थापत्य) तथा साहित्यिक वाङ्मय की विपुलता, वैज्ञानिक अन्वेषणों की विलक्षण उपलब्धियों पारिस्थितिकी के अनुरूप तकनीकी दक्षता, आयुर्वेद चिकित्सा व भक्ष्याभक्ष्य विचार , योग साधना, पर्यावरण के प्रति भारतीय दृष्टि, कृषि व उद्योग का उत्कर्ष, अर्थ - चिन्तन की शुचिताएँ, राजनीति व दण्ड विधान की मौलिकता के साथ परिशिष्ट में भारतीय ऋषि परम्परा, महाभारत काल पश्चात् हुए राजवंशों तथा प्रमुख भारतीय पर्व व त्योहारों की सूचियों के अतिरिक्त वैश्विक विद्वानों द्वारा भारतीय ज्ञान परम्परा की प्रशस्ति में व्यक्त किए गए। उदगारों को समावेशित किया गया है। पुस्तक का नाम : भारत वैभव लेखक : ओम प्रकाश पाण्डेय प्रकाशन वर्ष : 2020 प्रकाशन संस्था

भोलाराम का जीव : हरिशंकर परसाई

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 ऐसा कभी नहीं हुआ था… धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग या नर्क में निवास-स्थान ‘अलाट’ करते या रहे थे- पर ऐसा कभी नहीं हुआ था. सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर देख रहे थे. गलती पकड़ में ही नहीं आर ही थी. आखिर उन्होंने खीझकर रजिस्टर इतनी ज़ोर से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गई. उसे निकालते हुए वे बोले, “महाराज, रिकार्ड सब ठीक है. भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना हुआ, पर यहाँ अभी तक नहीं पहुंचा.” धर्मराज ने पूछा, “और वह दूत कहां है?” “महाराज, वह भी लापता है.” इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बडा बदहवास-सा वहाँ आया. उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था. उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, “अरे तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?” यमदूत हाथ जोडक़र बोला, “दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊँ कि क्या हो गया. आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर इस बार भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया. पाँच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम की देह को त्या

पिताजी : भूपेंद्र रावत

पापा तो बस ख़ुद को समझाते रह गए बच्चों की ख्वाइशों को अपना बताते रह गए जिसके कभी ना आयी माथे पर सिकन  बच्चों को परेशानी में देख आंसू बहाते रह गए बाहर से कठोर और भीतर से नरम थे वो अपने दर्द को भीतर छुपाते रह गए ज़िंदगी में जरूरत तो हज़ार थी उनकी भी, लेकिन हमारी फरमाइशों के लिए खुद, ज़रूरतों पर मरहम लगाते रह गए। आभूषण बनी रही मुस्कान हमारे लबों की हमारी मुस्कान को बस वो और सज़ाते रह गए। दरख़्त थे वो, जो खड़े रहे  हर मुश्किल क्षण में  सूरज की तपिश में स्वयं तपाते रहे गए।                                              - भूपेंद्र रावत 

स्त्रियाँ : भूपेंद्र रावत

 कहना है कुछ लोगों का  कमजोर होती है स्त्रियाँ  क्योंकि,धकेल दिया जाता है  शुरू से उसे उस गर्त में  जहां पहले से ही  बेचारी समझकर  समझा दिया जाता है,  पाठ ज़िंदगी का तुम्हारी जगह है  घर के भीतर की चारदीवारी। कर दी जाती है सीमित  उसकी आकांक्षाएं। उन्हीं आकांक्षाओ ने उसे सीखा दिया जीना पिंजरे में। अब उस स्वर्ण जैसे पिंजरे में उसे देनी पड़ती है आहुति अपने सपनों की पराया धन समझकर  नम आंखों के साथ कर दी जाती है विदा अपनी इच्छाओं की  तिलांजलि दे, पुनः सजाती है, एक ख़्वाब,फूटते हुए अंकुर में   समाहित है,दफन हुए ख्वाबों  के सच होने की ख्वाईश। - भूपेंद्र रावत