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अंत की शुरुआत : मनोज कुमार

         अंत की शुरुआत  बैठा हूँ एक अंधेरे कोने में, बुझे हुए अरमानों की लौ लिए ये मेरे अंत की शुरुआत है। तन्हाई को सीने में लिए कुरेद रहा बीते लम्हों को शायद ये मेरे अंत की शुरुआत है। पल-पल सिमट रहा मुझ में मैं अपनी ही खोह में मुँह छिपाये बैठा अपने अंतर्मन की आत्मा से उधेड़बुन करता  ये मेरे अंत की शुरुआत है। सोचता हूँ तो कांप जाता हूँ कितना भयावह होगा मेरा ये अंत, पर मुझे फिक्र नहीं, क्योंकि मैं मरूँगा शान से, मैंने जिंदगी की धज्जियाँ उड़ाई हैं।                                                                 -   डॉ. मनोज कुमार